वो बांसुर की धुन और वह शानदार सफर…
एक यादगार दिन
सन 1993…
ऋषिकेश की पवित्र वादियों में बसा नीलकंठ महादेव मंदिर… और उस यात्रा की कुछ अनमोल यादें जिन्हें मैंने आज तक अपने दिल और तस्वीरों में सहेज कर रखा है इस तस्वीर में मेरे साथ मेरे अत्यंत प्रिय मित्र मनोज चौरसिया जी भी हैं एक ऐसे कलाकार जिनकी शहनाई की धुन सीधे आत्मा को छू लेने की क्षमता रखती थी वे न केवल शहनाई वादन में निपुण थे बल्कि उनका गायन भी उतना ही मधुर था
उस यात्रा का एक छोटा-सा प्रसंग जो उस समय तो एक सामान्य घटना थी लेकिन आज जब याद आता है तो एक गहरी मुस्कान और हल्की सी टीस दोनों दे जाता है
हम ऋषिकेश से हरिद्वार लौट चुके थे और बस अड्डे पर दिल्ली जाने वाली बस का इंतजार कर रहे थे थोड़ी देर बाद बस आई और हम उसमें सवार हो गए बस अभी पूरी तरह भरी नहीं थी कुछ सीटें खाली थीं तभी हमारी सीट से कुछ आगे बैठे एक व्यक्ति ने अपनी बांसुरी निकालकर एक फिल्मी गीत की धुन बजानी शुरू कर दी
उसकी बांसुरी की आवाज़ बस में एक अलग ही माहौल बना रही थी। अधिकांश यात्री और मैं भी उस धुन का आनंद ले रहे थे लेकिन मेरे साथ बैठे मनोज के चेहरे पर एक अलग ही भाव था
एक कलाकार की पैनी नजर और कान, जो हर सुर और बेसुर को पहचान लेते हैं
अचानक मनोज के धैर्य का बांध टूट गया और उन्होंने ज़ोर से कह दिया
बेसुरा है क्या.?
उनकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि बांसुरी बजाने वाले तक पहुंच गई उसने पीछे मुड़कर देखा और थोड़े आक्रोश में बोला
अगर मैं बेसुरा बजा रहा हूँ तो तुम सुर में बजाकर दिखाओ
स्थिति थोड़ी असहज हो गई मनोज पहले तो टालते रहे लेकिन सामने वाले को लगा कि शायद उन्हें बांसुरी बजानी आती ही नहीं उसने व्यंग्य में कहा
बस इतना ही ज्ञान है सुर का?
मैंने मनोज को उकसाया ले लो बांसुरी और दिखा दो
पर मनोज ने शांत स्वर में कहा
बांसुरी झूठी है मैं नहीं बजाऊँगा
इस पर सामने वाला तुरंत बोला
अच्छा नाच ना आवे आँगन टेढ़ा
तकरार बढ़ ही रही थी कि तभी एक अद्भुत संयोग हुआ बस के बाहर एक बांसुरी बेचने वाला आ गया जैसे किस्मत ने खुद इस कहानी को मोड़ देने का निर्णय ले लिया हो
वह सज्जन बोले
चलो मैं तुम्हें नई बांसुरी दिलवाता हूँ तब तो बजाओगे?”
मनोज ने उस बांसुरी वाले से सबसे महंगी बांसुरी उठाई… और आश्चर्य की बात यह कि उस व्यक्ति ने बिना हिचकिचाहट वही बांसुरी खरीदकर उन्हें दे दी
और फिर…
जैसे ही मनोज ने बांसुरी होठों से लगाई पूरा माहौल बदल गया
बस में एक सन्नाटा छा गया… और फिर गूंजने लगी एक ऐसी धुन जो सीधे दिल में उतर रही थी
हर कोई मंत्रमुग्ध था
वह सज्जन भी, जिन्होंने अभी-अभी उन्हें चुनौती दी थी अब विस्मय से उन्हें देख रहे थे
मनोज ने फिर दो गीत भी सुनाए
“ना बोल पी पी मोरे अंगना, पंछी जा रे जा…”
और
क्यों जिंदगी की राह में मजबूर हो गए…
उनकी आवाज़ और बांसुरी की जुगलबंदी ने उस बस को एक चलता-फिरता संगीत सभागार बना दिया था
बस अब पूरी भर चुकी थी और दिल्ली की ओर बढ़ रही थी
हर यात्री आपस में एक ही बात कर रहा था
लड़का बहुत अच्छा बांसुरी बजाता है…
वह सज्जन बार-बार पूछते रहे
क्या आप कोई कलाकार हैं?
लेकिन मनोज ने न खुद बताया न हमें बताने दिया कि वे एक उत्कृष्ट शहनाई वादक हैं शायद सच्चे कलाकार की यही पहचान होती है कला बोलती है कलाकार नहीं
आज उस घटना को वर्षों बीत चुके हैं…
न जाने उस बस के कितने यात्रियों को वह दिन याद होगा…
पर मुझे पूरा यकीन है
जिस व्यक्ति ने वह बांसुरी खरीदी थी उसे यह पल जरूर याद होगा
और मुझे…
मुझे तो आज भी हर एक लम्हा हर एक सुर हर एक मुस्कान—सब कुछ वैसा ही याद हैजैसे कल की बात हो
कुछ यादें समय के साथ धुंधली नहीं होतीं…
बल्कि और भी गहरी हो जाती हैं
: – ललित भसोढ़
: – बातें कही अनकही दिल्ली
