"वेतन-भत्तों का चौराहा जहां पक्ष-विपक्ष गले मिलते हैं"

वाह रे नेताओं तुम्हारा भी जवाब नहीं

भारत की राजनीति भी बड़ी अद्भुत है यहां सिद्धांत और सुविधाएं अक्सर अलग-अलग रास्तों पर चलती हैं पर जब “सुविधा” का मोड़ आता है तो सभी रास्ते एक ही चौराहे पर आकर मिल जाते हैं सदन के भीतर का दृश्य बड़ा रोचक होता है जब जनता से जुड़े किसी मुद्दे पर बहस होती है तो पक्ष और विपक्ष ऐसे आमने-सामने खड़े हो जाते हैं मानो महाभारत का युद्ध चल रहा हो एक-दूसरे की बात काटना विरोध करना आरोप-प्रत्यारोप लगाना… सब कुछ पूरे जोश के साथ पर जैसे ही मुद्दा आता है “वेतन और भत्तों” का वही योद्धा अचानक एकता का अद्भुत उदाहरण बन जाते हैं लगता है जैसे वर्षों से बिछड़े भाई एक साथ मिल बैठे हों विपक्ष को सरकार की हर योजना में खामी दिख जाती है चाहे वह सड़क हो पानी हो या बिजली पर वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव आते ही खामियां छुट्टी पर चली जाती हैं उस समय न कोई विचारधारा याद रहती है न कोई विरोध बस एक ही लक्ष्य “जनसेवा के लिए संसाधन बढ़ाना”और बात करें टेलीफोन,मोबाइल और इंटरनेट भत्तों की तो यह भी किसी रहस्य से कम नहीं आज जब आम जनता सस्ते डेटा और कॉल के जमाने में जी रही है तब भी हमारे जनप्रतिनिधि हजारों रुपये का भत्ता लेते हैं शायद उनके फोन कॉल भी “विशेष श्रेणी” के होते होंगे ऐसे कॉल जो आम आदमी की समझ से परे हों सबसे दिलचस्प बात यह है कि सदन में कभी किसी ने खड़े होकर यह नहीं कहा भाइयों और बहनों अब तो मोबाइल सस्ता हो गया है चलिए भत्ता कम कर देते हैं यह वाक्य शायद राजनीतिक शब्दकोश में शामिल ही नहीं है हां कभी-कभी कोई नेता प्रतीकात्मक रूप से एक रुपये वेतन लेने की घोषणा जरूर कर देता है लेकिन भत्तों का मोह ऐसा है कि वह भी अछूता नहीं रहता कुल मिलाकर हमारी राजनीति हमें यह सिखाती है कि मतभेद चाहे कितने भी गहरे क्यों न हों यदि विषय “स्वयं का हित” हो तो एकता अपने आप जन्म ले लेती है और यही वह एकता है जिसे देखकर शायद आम जनता सोचती है काश यही एकजुटता जनता के मुद्दों पर भी दिखती

: – ललित भसोढ़

: – बातें कही अनकही दिल्ली

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