"रिकार्ड नहीं रखा जाता" एक जवाब जिसने पारदर्शिता की पूरी व्यवस्था पर प्रशन चिन्ह लगा दिया...

जब रिकॉर्ड ही नहीं तो जवाब देही कैसी..?

रामनगर वार्ड 80 में वर्क्स डिपार्टमेंट से एक आरटीआई आवेदन के बाद उठे गंभीर सवाल...

भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) लोकतंत्र को सशक्त बनाने वाला एक ऐतिहासिक कानून माना जाता है इसका उद्देश्य शासन प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करना है ताकि नागरिक सरकारी कार्यों,व्यय,नीतियों और निर्णयों की जानकारी प्राप्त कर सकें यह कानून केवल सूचना देने का माध्यम नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण हैलेकिन समय के साथ यह प्रशन  उठने लगा है कि क्या आरटीआई अधिनियम की मूल भावना धीरे-धीरे कमजोर हो रही है? कई मामलों में सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी जटिल और निराशाजनक होती जा रही है रामनगर वार्ड-80 (सदर पहाड़गंज जोन,दिल्ली नगर निगम) से जुड़ा मामला इसी चिंता की ओर संकेत करता है

रामनगर वार्ड-80,सदर पहाड़गंज जौन कश्मीरी गेट दिल्ली का मामला

दिल्ली नगर निगम के वर्क्स विभाग से एक नागरिक द्वारा यह जानकारी मांगी गई कि निगम मुख्यालय से प्राप्त निर्माण सामग्री  जैसे सीमेंट, रेता,रोड़ी और बदरपुर का उपयोग किस स्थान पर किया गया सूचना एक निश्चित अवधि के लिए मांगी गई थी

आवेदक के अनुसार मांगी गई सूचना निर्धारित समयावधि में उपलब्ध नहीं कराई गई और मामला प्रथम अपील / शिकायत तक केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) तक पहुंचा सुनवाई के दौरान विभागीय अधिकारियों की ओर से यह कहा गया कि संबंधित सामग्री का ऐसा रिकॉर्ड नहीं रखा जाता हैं यदि यह कथन सही माना जाए तो इससे कई गंभीर प्रशासनिक और विधिक प्रशन  उत्पन्न होते हैं यदि रिकॉर्ड नहीं रखा जाता तो सामग्री का उपयोग और लेखा परीक्षण (Audit) कैसे होता है?

सार्वजनिक धन से खरीदी गई सामग्री की जवाबदेही कैसे तय होगी?

क्या यह सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 का उल्लंघन है?

धारा 4(1)(a) रिकॉर्ड प्रबंधन की कानूनी जिम्मेदारी

आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(a) स्पष्ट रूप से कहती है कि

प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण अपने रिकॉर्ड को सूचीबद्ध अनुक्रमित तथा व्यवस्थित रूप से संरक्षित करेगा जिससे सूचना आसानी से उपलब्ध कराई जा सके इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूचना देने की प्रक्रिया केवल आवेदन आधारित न हो बल्कि विभाग पहले से ही अपने अभिलेखों को व्यवस्थित रखे यदि किसी विभाग द्वारा वास्तव में रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है तो यह केवल सूचना उपलब्ध न होने का विषय नहीं बल्कि रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली पर गंभीर प्रशन भी उत्पन्न करता है

सुनवाई में उठे प्रक्रियात्मक प्रशन

मामले से जुड़े तथ्यों के अनुसार निम्न बिंदु सामने आए

सूचना देने में अत्यधिक विलंब ( 19 महीने 15 दिन )

पूर्व में अधूरी अथवा अस्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना सुनवाई की प्रक्रिया को लेकर प्रशन उठना आरटीआई आवेदनों की संख्या पर आपत्ति जैसी टिप्पणियां यदि ऐसे तथ्य प्रमाणित हों तो यह आरटीआई कानून की भावना के विपरीत माना जा सकता है क्योंकि अधिनियम नागरिकों को बिना कारण बताए सूचना मांगने का अधिकार देता है आरटीआई अधिनियम की धारा 6(2) कहती है सूचना मांगने वाले व्यक्ति से सूचना मांगने का कारण नहीं पूछा जाएगा अर्थात कोई नागरिक कितनी बार आवेदन करता है यह सूचना उपलब्ध कराने का आधार नहीं बन सकता धारा 20 दंडात्मक प्रावधान और उसका व्यवहारिक पक्ष आरटीआई अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत यदि जन सूचना अधिकारी

बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार करता है निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराता जानबूझकर गलत अथवा भ्रामक सूचना देता है सूचना नष्ट करता है

तो आयोग उस पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का व्यक्तिगत जुर्माना लगा सकता है

इसके अतिरिक्त आयोग विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही की अनुशंसा भी कर सकता है हालांकि व्यवहारिक स्तर पर यह देखा गया है कि कई मामलों में आयोग पहले यह जांचता है कि क्या अधिकारी की ओर से “उचित कारण” प्रस्तुत किया गया है यदि आयोग कारण को संतोषजनक मान लेता है तो दंड नहीं लगाया जाता यहीं से अक्सर आरटीआई कार्यकर्ताओं और आयोगों के दृष्टिकोण में अंतर दिखाई देता है

आरटीआई प्रक्रिया लंबा संघर्ष

एक सामान्य आरटीआई आवेदक को अक्सर निम्न चरणों से गुजरना पड़ता है

जन सूचना अधिकारी (PIO) को आवेदन

प्रथम अपील (FAA)

केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील/शिकायत

सुनवाई और अंतिम आदेश की प्रतीक्षा व्यवहार में यह प्रक्रिया कई महीनों से लेकर वर्षों तक चल सकती है इस दौरान आवेदक को समय संसाधन और मानसिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है आरटीआई प्रणाली के सामने उभरती चुनौतियां आज आरटीआई व्यवस्था के सामने कुछ प्रमुख समस्याएं दिखाई देती हैं

1. रिकॉर्ड प्रबंधन की कमी

धारा 4 के प्रावधानों का पूर्ण अनुपालन नहीं होना

2. सूचना देने में देरी

कानूनी समय सीमा का पालन न होना

3. आयोगों में लंबित मामलों का बढ़ना

जिससे सुनवाई में वर्षों लग सकते हैं।

4. अधूरी या अस्पष्ट सूचना देना

जिससे आवेदक को बार-बार अपील करनी पड़ती है

5. सूचना मांगने वालों का हतोत्साहन

यदि प्रक्रिया अत्यधिक लंबी और कठिन हो जाए

व्यापक प्रशन सूचना क्यों महत्वपूर्ण है?

सीमेंट,रेता,रोड़ी और अन्य निर्माण सामग्री केवल वस्तुएं नहीं हैं वे सार्वजनिक धन से खरीदे गए संसाधन हैं इनका उपयोग कहां और किस मात्रा में हुआ इसका रिकॉर्ड सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा है

यदि रिकॉर्ड व्यवस्थित न हों या उपलब्ध न कराए जाएं तो निम्न संभावनाओं पर प्रशन उठ सकते हैं संसाधनों के उपयोग में अनियमितता

व्यय और वास्तविक कार्य में अंतर

लेखा परीक्षण की पारदर्शिता

हालांकि बिना जांच या प्रमाण के किसी विशेष भ्रष्टाचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा लेकिन पारदर्शिता की कमी स्वयं संदेह पैदा करती है सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागजी कानून नहीं बल्कि लोकतंत्र की निगरानी का एक माध्यम है इसकी सफलता केवल नागरिकों के सक्रिय होने पर निर्भर नहीं करती बल्कि विभागों जन सूचना अधिकारियों और सूचना आयोगों की जिम्मेदार भूमिका पर भी निर्भर करती है यदि रिकॉर्ड व्यवस्थित हों समय पर सूचना दी जाए और कानून के प्रावधानों का प्रभावी पालन हो तो आरटीआई व्यवस्था नागरिकों और प्रशासन के बीच विश्वास को मजबूत कर सकती है लोकतंत्र में सूचना केवल अधिकार नहीं बल्कि जवाबदेही की नींव है और जहां सूचना सीमित होती है वहां प्रशन और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं

: – ललित भसोढ़

: – बातें कही अनकही दिल्ली

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