"पापा की परी"

बेटियां पापा की परी ही होती है

यह कहानी एक सत्य कथा है उस साधारण से पिता की है जिसने अपनी बेटी को कुछ दिनों की बीमारी में ही  खो दिया पर एक पिता का अपनी बेटी के प्रति उसका प्रेम असाधारण था नाम था उसका शमीम एक सीधा-सादा, मेहनती आदमी उसकी ज़िंदगी की सबसे प्यारी चीज़ थी उसकी बेटी “खुशबू” खुशबू उसकी जान थी उसकी हँसी में शमीम की दुनिया बसती थी वह अक्सर कहा करता था, “मेरी खुशबू परी है… ज़मीन पर उतरी एक रौशनी की किरण

लेकिन वक़्त को शायद कुछ और मंज़ूर था एक छोटी-सी बीमारी ने खुशबू को उससे छीन लिया ज़िंदगी की इस सबसे बड़ी चोट ने शमीम को अंदर से तोड़ दिया। दुनिया ने कहा, “समय हर घाव भर देता है” मगर शमीम को ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ

खुशबू को दफनाए अब दो साल हो गए थे लेकिन शमीम का दिल उस मिट्टी के नीचे दबी उस नन्ही जान में ही अटका रहा

हर सुबह वह कब्रिस्तान जाता  खुशबू की कब्र के पास सबसे पहले वह कब्र के आसपास की मिट्टी साफ करता सूखे पत्तों को हटाता,और फिर वहीं बैठकर उससे बातें करता लोग उसे पागल समझते थे लेकिन शमीम को लगता था कि खुशबू उसे सुन रही है… जैसे वो हमेशा सुनती थी

कभी वह गुलाब लेकर जाता कभी चमेली  खुशबू को फूल बहुत पसंद थे शमीम को याद था कि खुशबू कहा करती थी पापा चमेली की खुशबू में जादू है

रमज़ान में भी शमीम कब्र पर रोजा खोलने जाता एक छोटी सी थाली में खजूर और पानी रखकर बैठ जाता और कहता चलो खुशबू इफ्तार का वक़्त हो गया ईद पर मिठाई लेकर जाता जैसे वो अब भी खुशबू को अपनी हाथों से खिलाना चाहता हो

जब खुशबू के छोटे भाई का रिश्ता पक्का हुआ शमीम सबसे पहले यही कहने आया उसी कब्र पर  खुशबू तुम्हारे भाई का रिश्ता पक्का हो गया हैं

शादी की तारीख तय हुई तो शमीम मिठाई का डिब्बा लेकर कब्र पर आया बोला तेरी भाभी अच्छी है तुझसे मिलती-जुलती तू होती तो सबसे पहले तुझसे मिलवाता

समय बीतता रहा लेकिन शमीम की आदत नहीं बदली दो साल हो गए मगर हर सुबह वही सिलसिला  फूल बातें यादें

कब्र के पास बैठा वह शमीम अब ज़्यादा नहीं बोलता सिर्फ निहारता है उस पत्थर को जिस पर जैसे लिखा हो

“खुशबू शमीम पापा की परी”

लोग पूछते हैं तुम अब भी रोज़ आते हो?

वह बस मुस्कुराकर कहता है,

बेटियाँ कभी मरती नहीं… वो बस दिखना बंद कर देती हैं

इसी लिए तो “ललित” बेटियां सच में  परी होती है,अपने पापा की परी ..…हां हां बेटियां अपने की परी ही होती है

: – ललित भसोढ़

: – बातें कही अनकही दिल्ली

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