दो साल तक “लापता” रही मृत्यु प्रमाण पत्र की फ़ाइल :- सदर पहाड़गंज ज़ोन के भीतर क्या चल रहा था?
“दो साल ‘लापता’ फाइल दिल्ली नगर निगम के सिस्टम में दबें नागरिकों के हक़ की आवाज़”
दिल्ली के सदर पहाड़गंज ज़ोन, पुराना हिन्दू कालेज बिल्डिंग कश्मीरी गेट, दिल्ली में मृत्यु प्रमाण पत्र से जुड़ा एक मामला प्रशासनिक उदासीनता की खतरनाक सच्चाई को सामने लाता है यह सिर्फ एक देरी नहीं बल्कि सिस्टम के अंदर गहराई तक जमी लापरवाही की संस्कृति का जीवंत उदाहरण है
यह मामला वर्ष 2023 में विधिवत किए गए आवेदन से जुड़ा है सभी जरूरी दस्तावेज समय पर जमा किए गए इसके बावजूद फाइल लगातार दो वर्षों तक बिना किसी लिखित आपत्ति और औपचारिक अस्वीकृति के रोकी गई कमिश्नर से लेकर उपराज्यपाल तक लिखी गईं शिकायतें जब महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हमारे द्वारा मजबूर इस विषय को सीधे ही
दिल्ली नगर निगम के कमिश्नर कार्यालय दिल्ली मुख्यमंत्री कार्यालय,
उपराज्यपाल कार्यालय और उपायुक्त कार्यालय,सदर पहाड़गंज ज़ोन,कश्मीरी गेट को लिखित शिकायतें भेजीं इन शिकायतों में साफ तौर पर पूछा गया कि जब गलती आवेदक की नहीं है तो उसे बार-बार अलग-अलग कार्यालयों में क्यों भेजा जा रहा है? DHO का चौंकाने वाला जवाब “हमें कुछ पता नहीं” मामले में सबसे चिंता की बात यह रही कि ज़ोन के जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) ने स्पष्ट शब्दों में कहा “हमें नहीं पता आवेदन कैसे रुका और अब हम कुछ नहीं कर सकते एसडीएम से आदेश लाओ यह जवाब अपने आप में सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है जब विभागीय स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती तो पीड़ित आम नागरिक कहाँ जाए? मीडिया में शिकायत छपी फिर भी चुप्पी 9 जून 2025 को दिल्ली के एक बड़े हिंदी सांध्य दैनिक के लोकप्रिय कॉलम “लोग कहते हैं” में शिकायत प्रकाशित हुई लेकिन इसके बाद भी फाइल तुरंत नहीं चली जो यह दर्शाता है कि सिस्टम केवल तब हरकत में आता है जब ऊपर से दबाव पड़ता है ऊपर के कार्यालयों से हस्तक्षेप के बाद ही हिली फाइल आख़िरकार कमिश्नर कार्यालय,मुख्यमंत्री कार्यालय और उपराज्यपाल कार्यालय स्तर से हस्तक्षेप के बाद उपायुक्त कार्यालय सदर पहाड़गंज ज़ोन सक्रिय हुआ और लंबे इंतज़ार के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया गया यह प्रमाण पत्र जो कानूनन सीमित समय में जारी होना चाहिए लगभग दो वर्षों की दौड़-भाग के बाद मिला
बड़ा सवाल बिना दबाव क्या अधिकार नहीं?
यह मामला एक बेहद असहज सवाल छोड़ता है
क्या आज भी आम नागरिक को अपना वैध अधिकार पाने के लिए “ऊपर तक पहुंच” बनानी पड़ेगी?
क्या बिना दबाव और पत्राचार के सरकारी व्यवस्था काम करने में असमर्थ हो चुकी है? जवाबदेही अब भी गायब सबसे हैरानी की बात यह है कि अब तक सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया गया कि इस देरी के लिए किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई क्या किसी पर विभागीय कार्यवाही हुई क्या सिस्टम में सुधार किया गया जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे और आम नागरिक यूं ही सिस्टम की चक्की में पिसता रहेगा
: – ललित भसोढ़
: – बातें कहीं अनकहीं दिल्ली
