बाबासाहेब डॉ.भीमराव आंबेडकर दिल्ली के अंतिम वर्षों की अनकही गाथा
संघर्ष और समर्पण की अमर विरासत
डॉ.भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्हें करोड़ों लोग बाबासाहेब कहकर पुकारते हैं न केवल भारतीय संविधान के शिल्पकार थे बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा के अटूट प्रतीक भी उनका जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा था लेकिन उनके जीवन का अंतिम अध्याय दिल्ली में बीता जहां उन्होंने 1951 से 1956 तक निवास किया इन वर्षों में कई अनकही कहानियां छिपी हैं उनके अंतिम निवास निष्ठावान सहयोगियों की समर्पित सेवा मृत्यु की पहली सूचना और 15 जनपथ की ऐतिहासिक कड़ी
दिल्ली में अंतिम आशियाना: 26, अलीपुर रोड महापरिनिर्वाण स्थल
1951 में कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद बाबासाहेब ने सरकारी आवास (1, हार्डिंग एवेन्यू) छोड़ दिया। वे 26, अलीपुर रोड (अलीपुर रोड, सिविल लाइंस, विधान सभा के निकट) पर एक 10-कमरों वाले बंगले में शिफ्ट हो गए यह बंगला सिरोही रियासत के पूर्व शासक का किराए का था यहां वे अपनी दूसरी पत्नी डॉ. सविता आंबेडकर के साथ रहे
इसी घर में 6 दिसंबर 1956 की रात को बाबासाहेब ने अंतिम सांस ली—शांत नींद में लंबी बीमारी के बाद उनकी तबीयत कई दिनों से नाजुक थी आज यह स्थान डॉ.आंबेडकर नेशनल मेमोरियल के रूप में जाना जाता है जहां उनकी अस्थियां रखी गई हैं मूल बंगला ध्वस्त कर दिया गया लेकिन यहां अब एक भव्य स्तूप (19 फीट ऊँचा, 125 फीट परिधि वाला) है जो उनकी महापरिनिर्वाण भूमि को चिन्हित करता है यहां हर साल लाखों अनुयायी श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं
निष्ठावान सहयोगी होतीलाल पिपल साये की तरह साथ रहें
बाबासाहेब के दिल्ली प्रवास में सबसे निकट सहयोगी थे होतीलाल पिपल ( कुछ स्रोतों में पिपल या पिपले ) अल्मोड़ा/अलीगढ़ के निवासी पिपल जी 1950 के दशक से बाबासाहेब से जुड़े थे वे 22,पृथ्वीराज रोड से लेकर 26,अलीपुर रोड तक उनके साथ रहे—कागजात संभालने घर प्रबंधन और दैनिक सहायता में वे बाबासाहेब के लिए सच्चे सहयोगी थे जैसे साया
6 दिसंबर की रात बाबासाहेब का निधन हुआ
होतीलाल पिपल ही सबसे पहले इसकी सूचना देने वाले थे 5 दिसंबर की रात वे घर से निकले थे सुबह लौटे तो देखा कि बाबासाहेब अब इस दुनिया में नहीं। उन्होंने तुरंत आकाशवाणी को फोन किया और कहा “बाबासाहेब अब इस दुनिया में नहीं रहे” यह सूचना पूरे देश में फैली पिपल जी के पुत्र डॉ. रविंद्र कुमार ने भी इसकी पुष्टि की पिपल जी के समाजसेवा के जज्बे को देखते हुए बाबासाहेब के करीबी दादासाहेब बी.के. गायकवाड़ ( भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष ) ने उन्हें 15,जनपथ पर रिपब्लिकन पार्टी के कार्यालय में जगह दी वहाँ वे सचिव के रूप में काम करने लगे
15, जनपथ बाबासाहेब का नाम लेकिन गायकवाड़ जी की विरासत
आज 15, जनपथ पर डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर और डॉ.आंबेडकर फाउंडेशन स्थित है जहां बाबासाहेब की भव्य मूर्ति ( मूर्तिकार राम नारायण द्वारा निर्मित ) स्थापित है लेकिन बाबासाहेब कभी यहां नहीं रहे यह स्थान उनके परम सहयोगी भारतराव कृष्णाजी गायकवाड़ ( दादासाहेब गायकवाड़ ) से जुड़ा है
गायकवाड़ जी बाबासाहेब के निकटतम सहयोगी थे वे दो बार रिपब्लिकन पार्टी के सांसद चुने गए और 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बाबासाहेब के साथ बौद्ध धर्म अपनाया 1957 में सांसद बनने पर उन्होंने पिपल जी को 15 जनपथ बुलाया यहां रिपब्लिकन पार्टी का मुख्यालय था बाद में सरकार ने इसे आंबेडकर फाउंडेशन के रूप में विकसित किया—बाबासाहेब की शिक्षाओं को जीवित रखने के लिए
दिल्ली में बाबासाहेब की जीवंत स्मृतियां
14 अप्रैल 1956 (जन्मदिन) पर 26, अलीपुर रोड को दुल्हन की तरह सजाया गया पूरे दिन समारोह चला
दिल्ली में उनकी पहली प्रतिमा 1957 में रानी झाँसी रोड पर आंबेडकर भवन में स्थापित हुई
उनके साथ डॉ.सविता आंबेडकर नानक योगिनी चंद्रू और सेवक सुधामा रहे बाबासाहेब का दिल्ली प्रवास उनके जीवन का सबसे भावुक लेकिन सबसे प्रेरणादायक अध्याय है यहां उन्होंने “द बुद्ध एंड हिज धम्म” लिखा बौद्ध धर्म अपनाया और अंत तक संघर्ष जारी रखा उनकी मृत्यु ने करोड़ों दिलों को झकझोर दिया लेकिन उनकी शिक्षाएं शिक्षा,संगठित रहो और संघर्ष करों आज भी जीवित हैं
जय भीम! जय भारत!
: – ललित भसोढ़
: – बातें कही अनकही, दिल्ली
