“कलई वाले की पुकार… और पीतल की चमक वाली वो दुनिया”
कभी हमारे मोहल्लों की गलियों में एक आवाज़ बहुत परिचित हुआ करती थी
पीतल के बर्तन कलई करा लो…
यह पुकार सिर्फ एक कामकाज की घोषणा नहीं थी, बल्कि उस दौर की जिंदगी का हिस्सा थी जिसे अब याद करने पर मन अपने-आप बचपन की गलियों में लौट जाता हैं गर्मियों की दोपहर हो या सर्द सुबह कलई वाला अपने सामान के साथ गली के मोड़ पर आकर बैठ जाता था जमीन पर धौंकनी कोयले का चूल्हा छोटी-सी टोकरी में रांगा,नींबू और सफाई का घोल… और उसके सामने मोहल्ले के घरों से पीतल के बर्तनों का अंबार दूर से ही बुझते-बुझते अंगारों की चमक और धौंकनी की “फूँ… फूँ…” आवाज़ बताती थी कि आज फिर किसी घर के बर्तन नई चमक पहनने वाले हैं कितना सुहाना दृश्य हुआ करता था बूढ़े कारीगर का पसीना टपकता रहता पर उसके हाथों की सफाई देखने लायक होती थी वह बर्तन को धीरे-धीरे गर्म करता रांगा पिघलते ही उसे तेजी से चारों ओर फेर देता और देखते ही देखते काला पड़ चुका पीतल का बर्तन चांदी-सा दमक उठता बच्चे भी घेरकर खड़े रहते उन्हें वो चांदी सी चमक जादू जैसी लगती थी
उस वक़्त पीतल और तांबे के बर्तन हर घर की शान होते थे दही,छाछ,कढ़ी,दाल या सब्ज़ी हर चीज़ इन बर्तनों में पकती और परोसी जाती थी मगर साथ ही यह भी सच था कि बिना कलई के पीतल अम्लीय चीज़ों के संपर्क में आकर काला पड़ जाता और खाना भी बिगाड़ देता
इसलिए कलई सिर्फ एक परत नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा स्वाद और सेहत की गारंटी थी कहते थे “बर्तन की कलई, घर की भलाई” है यह काम सस्ता भी था और टिकाऊ भी। दो-तीन महीने में एक बार कलई करा लेना काफी होता मोहल्ले के कारीगर को हर कोई जानता था और वह भी अपने ग्राहकों के चहरे-पते पहचानता था। काम के साथ उसका अपनापन भी मिलता था “बहन जी, इस बार अच्छी कलई करूंगा बर्तन चमक उठेंगे”
“अरे छोटू, ज़रा पानी दे दे चाचा को” ऐसे ही रिश्तों में मोहल्ले की जिंदगी बसती थी आज जब यह परंपरा लगभग गायब हो चुकी है तो लगता है कि सिर्फ एक हुनर नहीं गया बल्कि उस दौर की सादगी अपनापन और घरेलू संस्कृति का एक हिस्सा भी खो गया है स्टील,एल्यूमिनियम और नॉन-स्टिक के बर्तनों ने पीतल की जगह ले ली जगह की कमी, रोज़गार का संकट और आधुनिक रसोई—सबने मिलकर कलई को एक स्मृति में बदल दिया पर सच कहें तो जब भी किसी पुराने बाजार में किसी को धौंकनी चलाते देखते हैं, या किसी शादी-ब्याह में पीतल का लोटा चमकता नज़र आता है, तो दिल अनायास कह उठता है “अरे, यही तो हमारी पुरानी दुनिया थी कभी सोचा भी नहीं था कि वह गली-गली घूमकर बर्तन चमकाने वाले कारीगर जो हमारी रसोई को सुरक्षित और सुंदर बनाते थे एक दिन इतिहास के पन्नों में बदल जाएंगे पर उनकी कला उनकी पुकार और पीतल के चमचमाते बर्तन ये सब हमारी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे
:- ललित भसोढ़
:- बातें कहीं अनकहीं, दिल्ली
