दो बीघा ज़मीन शोषण की अनंत सड़क....
विमल राय द्वारा निर्देशित कालजयी फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ (1953) केवल एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सामाजिक यथार्थ का दर्पण है बलराज साहनी द्वारा निभाया गया किरदार शंबू महतो उस किसान वर्ग का प्रतिनिधि है जिसके पास ज़मीन के नाम पर केवल दो बीघा मिट्टी है और उसी को बचाने के लिए वह अपनी देह,श्रम और स्वाभिमान तक दांव पर लगाने को मजबूर हो जाता है कर्ज़ के बोझ तले दबा शंबू कलकत्ता की सड़कों पर रिक्शा खींचता है ताकि अपनी ज़मीन साहूकार और जमींदार से बचा सके यह संघर्ष सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस दौर के लाखों किसानों की कहानी थी स्वतंत्रता के बाद का नेहरू युग सामाजिक न्याय और भूमि सुधार के बड़े वादों से भरा था लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग थी जमींदारी प्रथा के औपचारिक अंत के बावजूद शोषण के ढांचे बने रहे किसान कर्ज़ में फंसा रहा साहूकार और ताकतवर वर्ग व्यवस्था का लाभ उठाता रहा ‘दो बीघा ज़मीन’ ने उस समय की इस विडंबना को बेहद संवेदनशीलता और ईमानदारी से उजागर किया
2026 में खड़े होकर सवाल
आज जब हम 2026 में खड़े हैं तो सवाल उठता है—क्या हालात बदले हैं.?
जवाब असहज करने वाला है शोषण बदला नहीं,सिर्फ उसका रूप बदला है
आज जमींदार की जगह कॉर्पोरेट ताकतें खड़ी हैं ज़मीन अब साहूकार नहीं, बल्कि नीतियों कानूनों और विकास परियोजनाओं के नाम पर छीनी जा रही है हाईवे एयरपोर्ट,स्मार्ट सिटी और औद्योगिक कॉरिडोर के नाम पर किसान आंदोलनों की गूंज विशेषकर 2020–21 का दिल्ली बॉर्डर आंदोलन अभी भी हमारी सामूहिक स्मृति में ताज़ा है जहां लाखों किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे सरकारी दावों के बीच किसान आत्महत्याओं के आंकड़े एक भयावह सच्चाई बयान करते हैं कर्ज़ फसल नुकसान जलवायु परिवर्तन और बाज़ार की अनिश्चितता ने किसान को आज भी उसी मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां शंबू महतो खड़ा था
शंबू का रिक्शा और आज की इकॉनॉमी आज का शंबू कलकत्ता की सड़क पर रिक्शा नहीं खींचता बल्कि किसी ऐप के लिए गाड़ी चलाता है इसे स्वरोज़गार कहा जाता है लेकिन हकीकत में यह भी एक नया शोषण तंत्र है बिना सामाजिक सुरक्षा, बिना बीमा बिना स्थिर आय मजदूर मशीन बन चुका है और इंसान की गरिमा अब एल्गोरिदम और रेटिंग से तय होती है
व्यवस्था का पाखंड तब जमींदार लाठी लेकर आता था आज फाइलों कानूनों और नीतियों के ज़रिये वही काम किया जाता है किसान की आवाज़ आज भी दबा दी जाती है कभी मीडिया के शोर में कभी राष्ट्रवाद और विकास के नारों में
सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या ‘डिजिटल इंडिया’ में दो बीघा ज़मीन की कीमत एक स्मार्टफोन ऐप से भी कम हो गई है?
‘दो बीघा ज़मीन’ कोई बीती हुई कहानी नहीं है यह आज भी ज़िंदा है हर उस किसान,मजदूर और आम आदमी में जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहा है
अगर हमने समय रहते सवाल नहीं उठाए तो शंबू की कहानी बार-बार दोहराई जाएगी शोषण की यह सड़क अनंत होती जाएगी, और हर पीढ़ी अपना-अपना रिक्शा खींचती रहेगी
अब वक्त है देखने का नहीं जागने का
वरना ‘दो बीघा ज़मीन’ सिर्फ एक फिल्म नहीं हमारी सामूहिक नियति बन जाएगी
:- ललित भसोढ़
:- बातें कही अनकही,दिल्ली
