एमटीएनएल : – कभी महानगरों की लाइफलाइन आज खामोशी की गवाही

एमटीएनएल : - कभी महानगरों की लाइफलाइन आज खामोशी की गवाही

एमटीएनएल कभी दिल्ली और मुंबई की जीवनरेखा माने जाने वाले महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) की हालत आज बेहद चिंताजनक है। आधुनिक संचार की दौड़ में पिछड़ चुका यह सार्वजनिक उपक्रम अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है

दिल्ली के ऐतिहासिक ईदगाह एक्सचेंज की तस्वीर इस बदहाली की सबसे बड़ी गवाह है एक समय था जब यह एक्सचेंज उपभोक्ताओं की भीड़ से गुलजार रहा करता था नया टेलीफोन कनेक्शन लेना हो एसटीडी पीसीओ लगवाना हो या फिर बिल जमा करना हर कार्य के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती थीं। दर्जनों काउंटरों के बावजूद लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था एक्सचेंज के बाहर खाने-पीने की दुकानों और खोमचों की चहल-पहल सुबह से ही शुरू हो जाती थी और शाम तक बनी रहती थी यह इलाका न सिर्फ संचार सुविधा का केंद्र था बल्कि आसपास के लोगों की आजीविका का भी साधन बना हुआ था

लेकिन आज..

वही ईदगाह एक्सचेंज वीरान पड़ा है ग्राहक तो दूर अब उसके बाहर एक भी दुकान नजर नहीं आती चारों ओर उग आए झाड़-झंखाड़ और जंगली पेड़ एमटीएनएल की अनदेखी और उपेक्षा की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। कभी भारत सरकार के ‘नवरत्नों’ में शामिल इस कंपनी की हालत यह हो गई है कि न तो इसकी सेवाओं में दम बचा है, और न ही इसके ढांचों में कोई जान

आधुनिकता में पिछड़ता एमटीएनएल

जब देश में संचार क्रांति की लहर आई और निजी कंपनियों ने हाई-स्पीड इंटरनेट मोबाइल कनेक्टिविटी और 24×7 सेवा जैसी सुविधाओं के साथ बाजार पर कब्जा जमाना शुरू किया तब एमटीएनएल अपनी धीमी चाल और सरकारी व्यवस्थाओं की जकड़ में उलझा रह गया तकनीकी अद्यतन और ग्राहक सुविधा जैसे जरूरी सुधारों की ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया

सरकारी उपेक्षा और भारी कर्ज का बोझ

सरकारी संरक्षण होने के बावजूद एमटीएनएल पर बढ़ता कर्ज और कर्मचारी पेंशन जैसी जिम्मेदारियों ने इसकी रीढ़ तोड़ दी है निजी कंपनियों की आक्रामक प्रतिस्पर्धा और सरकारी नीति की अस्पष्टता ने एमटीएनएल को इस स्थिति में ला खड़ा किया है जहाँ इसके पुनर्जीवन की संभावनाएं क्षीण नजर आ रही हैं

क्या यह 'सफेद हाथी' अंत की ओर है?

एक जमाने में जो कंपनी भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक थी वह आज बंद दरवाजों और खाली गलियारों का नमूना बन चुकी है यदि सरकार समय रहते कठोर और ठोस कदम नहीं उठाती तो यह सार्वजनिक संस्था धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएगी

 

सरकार को चाहिए कि वह एमटीएनएल के आधुनिकीकरण निजी निवेश के लिए मार्ग प्रशस्त करने और डिजिटल युग के अनुरूप पुनर्गठन जैसे उपाय तत्काल प्रभाव से अपनाए वरना यह ‘सफेद हाथी’ केवल सरकारी बोझ बन कर दम तोड़ देगा

: – ललित भसोढ़

: – बातें कहीं अनकहीं, दिल्ली

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