(दिल्ली से हरिद्वार तक जब मानवता बनी वारिस अस्थि कलश यात्रा का 25,वां वर्ष )
श्री देवोत्थान सेवा समिति (पंजी.) द्वारा आयोजित पितृपक्ष की सबसे बड़ी व ऐतिहासिक अस्थि कलश विसर्जन यात्रा एक अनुपम धार्मिक-सामाजिक पहल है जो लावारिस और असंरक्षित अस्थियों के वारिस बनकर हुतात्माओ को मां गंगा की गोद में समर्पित कर मोक्ष प्रदान करती है यह यात्रा हिंदू परंपरा के अनुसार पितृपक्ष के दौरान आयोजित की जाती है जब हुतात्माओं की शांति के लिए विशेष महत्व होता है समिति की स्थापना 2003 में हुई थी और तब से यह यात्रा 25 सालो यानि की 2025 तक सफलतापूर्वक संपन्न हो चुकी है प्रत्येक यात्रा में हजारों अस्थि कलशों को दिल्ली से हरिद्वार ले जाया जाता है जहां कनखल के सती घाट पर वैदिक विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है
यात्रा का उद्देश्य और पृष्ठभूमि :-
विसर्जन यात्रा का मुख्य उद्देश्य उन अनाम आत्माओं को मुक्ति देना है जिनके लिए कोई परिवार नहीं होता भारत के श्मशान घाटों से एकत्रित लावारिस अस्थियां साथ ही पाकिस्तान,बांग्लादेश और अन्य देशों से आने वाली हिंदू-सिख समुदाय की अस्थियां इस यात्रा का हिस्सा बनती हैं समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनिल नरेंद्र जी और महामंत्री विजय शर्मा जी के नेतृत्व में यह कार्य 25 वर्षों से लगातार जारी है यात्रा का नाम “देवोत्थान” देवोत्थान एकादशी से प्रेरित है जो भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है कुल मिलाकर इन यात्राओं में 1 लाख 69 हजार 618 अस्थियां कलशों को मां गंगा में मोक्ष करा चुकी है
विसर्जन यात्रा एक सुनियोजित और भावपूर्ण प्रक्रिया है जो दिल्ली से शुरू होकर हरिद्वार में समापन की जाती है यह सामान्यत पितृपक्ष के अंतिम दिनों ( सितंबर-अक्टूबर ) में आयोजित होती है लेकिन तीन विशेष यात्राएं ( पाकिस्तान से आई अस्थियों के लिए ) समय-समय पर अलग से निकाली गई है



अस्थि कलशों का संग्रहण
समिति दिल्ली के प्रमुख निगम बोध घाट पर एकत्रित करती है
प्रत्येक अस्थि कलशो को मिट्टी की मटकी व सफेद और लाल रंग के बड़े थैलो में सामूहिक रुप से एकत्रित किया जाता है जिसमें चंदन,फूल और पवित्र सामग्री डाली जाती है
विदेशो से आई अस्थियों को पाकिस्तान के कराची से विशेष प्रयासों से लाई जाती हैं उदाहरण स्वरूप वीजा और सीमा अनुमतियों के बाद इन्हें अट्टारी बार्डर से दिल्ली समिति के एक दल द्वारा लाया जाता है
यात्रा से छह महीनों पहले से संग्रहण शुरू होता है और फिर यात्रा तिथि से दो दिन पूर्व समिति की युवा टीम सभी हजारो अस्थि कलशों साफ करके ( राख अलग और अस्थियां अलग ) पैकिंग करती है श्रद्धांजलि सभा और यात्रा प्रस्थान नई दिल्ली के आई.टी.ओ.स्थित शहीदी पार्क से भव्य शोभा यात्रा बैंड बाजो के साथ शुरू होती है
इसमें भजन-कीर्तन मंत्रौच्चार और संत महात्माओं के प्रवचन होते हैं प्रमुख अतिथि इस कार्य में महादेव की प्रेरणा से आते हैं जिसमें सांसद,मंत्री,प्रशासनिक अधिकारी,सामाजिक कार्यकर्ता कलशों को प्रणाम करते हैं
कलशों को सजाए गए वाहनों महादेव के विशालकाय रथ पर महादेव की प्रतिमा के चरणों में रखे जाते हैं जिन्हें फूलों और ध्वजों से सुसज्जित किया जाता हैं दिल्ली पुलिस और यातायात विभाग का सहयोग यात्रा में प्राप्त होता है जिससे यात्रा सुगम रहती है यात्रा में 300 से 400 शिवभक्त श्रद्धालु भाग लेते हैं
मार्ग और ठहराव :-
दिल्ली से हरिद्वार (लगभग 220 किमी) की यात्रा सुबह 10 बजे शुरू होती है जो शाम 7 बजे हरिद्वार पहुंचती है, रास्ते में करीब 10 स्थानों पर सैकड़ों श्रद्धालु पुष्पांजलि अर्पित कर रथ को आगे रवाना करते हैं
प्रमुख ठहराव लक्ष्मी नगर,प्रीत विहार, शाहदरा ओसवाल भवन,दिलशाद गार्डन वृंदावन गार्डन, गाजियाबाद,मोदीपुरम,मेरठ, मुजफ्फरनगर,रुड़की में होती हैं जहां स्थानीय सभाएं आयोजित की जाती हैं
मेरठ में अक्षरधाम कॉलोनी सभी 400 श्रद्धालुओं के गर्मागर्म भोजन की व्यवस्था होती है जहां श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है
उत्तराखंड के नारसन बार्डर पुण्य दाई सेवा समिति न्यास द्वारा स्वागत समारोह होता है जहां स्थानीय प्रशासन कलशों की अगवानी करता है यात्रा रात्रि में निष्काम सेवा ट्रस्ट भूपतवाला में विश्राम करती है
हरिद्वार में विसर्जन :-
अगले दिन हरिद्वार के भूपतवाला से शोभा यात्रा 14 किलोमीटर दूर कनखल सती घाट पहुंचती है सती घाट पर वैदिक पंडितों द्वारा पूर्ण कर्मकांड किया जाता है 100 किलो दूध की धारा के साथ सभी कलशो का सामूहिक विसर्जन किया जाता है जो गंगा को विशेष समर्पण का प्रतीक है
समापन भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण से होता है प्रत्येक यात्रा में हजारों की संख्या में कलश विसर्जित होते हैं
हाल की यात्राओं के विशेष उदाहरण
25 वीं सिल्वर जुबली यात्रा बीते 19 सितंबर 2025 को दिल्ली के आई.टी.ओ.से रवाना हजारों अस्थि कलशों का विसर्जन सती घाट पर किया गया
यात्रा की विशेषताएं और प्रभाव :-
धार्मिक महत्व सनातन धर्म में अस्थि कलशों का गंगा में विसर्जन करने से मोक्ष मिलता है यात्रा में कलश कभी जमीन पर नहीं रखे जाते इसकार्य में स्वयंसेवक निःशुल्क सेवा करते हैं और भंडारे से हजारों को भोजन मिलता है
चुनौतियां :-
विदेशी अस्थियों के लिए वीजा सीमा सुरक्षा और महामारी जैसी बाधाएं आती रहती है,फिर भी समिति का संकल्प अटल है
भविष्य में :-
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की योजना जिसमें अधिक देशों में रखी असंरक्षित सनातनी भाई बहनों की अस्थियां शामिल होंगी यह विसर्जन यात्रा न केवल धार्मिक कर्तव्य है बल्कि मानवता की सेवा का प्रतीक भी है समिति के महामंत्री विजय शर्मा जी के शब्दों में “जब तक एक भी लावारिस अस्थि श्मशान में पड़ी रहेगी हमारा कार्य निरंतर जारी रहेगा” यदि आप इसमें योगदान देना चाहें तो समिति से संपर्क करें
जय गंगा मैया
:- ललित भसोढ़ दिल्ली
