अप्रैल फूल का पहला और आख़िरी मज़ाक.....

अप्रैल फूल मनाने की परंपरा कब शुरू हुई इसका तो मुझे ठीक-ठीक ज्ञान नहीं पर इतना अवश्य जानता हूँ कि कुछ समय पहले तक इसे बड़े उत्साह से मनाया जाता था एक अप्रैल आते ही लोग झूठ बोलकर एक-दूसरे को बेवकूफ़ बनाते थे और इस ‘मज़ाक’ को बड़ा शौक़ से निभाया जाता था पर मेरे जीवन में अप्रैल फूल का एक ऐसा अनुभव आया जिसने इसे हमेशा के लिए मेरा पहला और आख़िरी मज़ाक बना दिया यह घटना उस समय की है जब मेरी दादी जिन्हें हम सब प्यार से ‘जियो’ कहते थे लगभग अस्सी बरस की थीं उम्र भले बढ़ रही थी पर उनका स्वास्थ्य,ऊर्जा और व्यक्तित्व सब कुछ अब भी जवानी जैसा था काले-घने बाल बत्तीस के बत्तीस मजबूत दंत और आँखें भी पास-दूर साफ़ दिखाई देती थीं उम्र जैसे उन पर ठहर-सी गई थी 31 मार्च की शाम एक शरारत का बीज उस शाम न जाने कैसे मन में एक शरारत कौंधी मैंने अपने पिताजी की बुआ:जिन्हें सब ‘मन्नो जीजी’ के नाम से जानते थे के घर फोन लगाया फोन उनके बेटे ने उठाया। और हौले से बिना सोचे-समझे मैंने कह दिया जियो नहीं रहीं… कल सुबह अंतिम संस्कार होगा उधर जैसे किसी ने दिल पर हथौड़ा मार दिया हो रुआंसी आवाज़ में बोला “भाई,यह कैसे हो गया.? अभी दो दिन पहले तो मामी बिल्कुल ठीक-ठाक मिलकर गई थीं…मैंने कहा कि यह सब अचानक हुआ है और जीजी को अभी मत बताना वरना रातभर नहीं सो पाएंगी फोन रख दिया… और मैं भूल भी गया कि कौन-सी चिंगारी मैंने हवा में छोड़ दी है लेकिन यह ‘झूठ’ दिल्ली से मेरठ फिर मेरठ से दिल्ली तक आंधी की तरह फैल गया रिश्तेदार परिचित सबके कानों में यह बात पहुंच चुकी थी सुबह एक अनचाहा तूफ़ान आया अगली सुबह सब सामान्य था हम सब चाय-नाश्ता कर रहे थे तभी अचानक किसी औरत के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ ने घर को हिला दिया हम सब घबराकर बाहर निकलेऔर देखा मन्नो जीजी फूट-फूटकर रोते हुए आ रही थीं दादी चारपाई पर बिल्कुल ठीक बैठी थीं पर जीजी की आँखों में शोक था दुख था ग़लत सूचना का बोझ था दादी को जीवित देखकर वह उनसे लिपट गईं और रोते-रोते बोलती जा रही थीं“मेरी भाभी… तू ठीक है भाभी… तू ठीक तो है.?दादी भी उनकी हालत देखकर बिना समझे खुद भी रोने लगी घर में एक अजीब-सी करुणा एक अजीब-सा भावुक वातावरण बन गया था आस-पास के लोग भी नम हो गए थोड़ी देर बाद जब पानी पिलाकर उन्हें संभाला, तब उन्होंने बताया बच्चों ने सुबह बताया कि ललित ने रात को फोन करके कहा कि भाभी मर गईं… मेरे तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई मैं तो कफ़न तक लेकर चली आई हां जीजी सचमुच एक कफ़न लेकर आई थीं उन्हें लगा था कि अब अंतिम कर्तव्य निभाना है

दादी ने भी वह कफ़न देखते ही उसे अपने कनस्तर में सहेज दिया और कहा “मेरी मौत के बाद यही कफ़न ओढ़ाना मुझे” और हमारे लिए यह उनकी एक अंतिम इच्छा थी जिसे बाद में उनके देहांत पर पूरा किया गया था

मैं चुप था… बहुत चुप मेरी शरारत ने इतने लोगों के दिल दहला दिए थे और मैं पहली बार समझ रहा था कि शब्द चाहे सच हों या झूठ असर कितना गहरा छोड़ सकते हैं

एक आजीवन व्रत उस दिन मैंने मन ही मन प्रतिज्ञा की—

अब कभी भी अप्रैल फूल का मज़ाक नहीं करूँगा। न किसी के जाने का, न किसी के रोने का, न किसी के टूटने का आज भी जब वह दिन याद आता है तो कहीं न कहीं आँखें भर ही आती हैं जिंदगी चलती रहती है—हम रहें या न रहें पर कुछ अनुभव हमें भीतर से बदल देते हैं यह वही अनुभव था जिसने मुझे सिखाया कि मज़ाक और दर्द की सीमा बहुत महीन होती है

:- ललित भसोढ़

:- बातें कहीं अनकहीं, दिल्ली

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