"बूढ़ी काकी एक पात्र नहीं, आज के समाज का आईना है"
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘बूढ़ी काकी’ केवल एक वृद्ध स्त्री की कथा नहीं है बल्कि वह मनुष्य के भीतर मरती जा रही संवेदना का मार्मिक दस्तावेज़ है कहानी की बूढ़ी काकी अशक्त है निर्बल है और दूसरों पर आश्रित है पर सबसे अधिक वह उपेक्षित है उसका सबसे बड़ा अपराध यही है कि अब वह किसी काम की नहीं रही कहानी में केवल एक बूढ़ी काकी है लेकिन आज के दौर में प्रश्न यह है कि क्या सच में केवल एक ही है? नहीं आज का समाज अनगिनत बूढ़ी काकियों और बूढ़े काकाओं से भरा पड़ा है जो हमारे ही घरों में हमारे ही आसपास हमारी ही आंखों के सामने जीते हुए भी अनदेखे हैं मुंशी प्रेमचंद की बूढ़ी काकी को भोजन से अधिक जिस चीज़ की भूख थी वह था स्नेह सम्मान और अपनापन आज के वृद्ध भी उसी भूख से जूझ रहे हैं फर्क सिर्फ इतना है कि तब संयुक्त परिवार था आज फ्लैट हैं तब उपेक्षा मौन थी आज वह व्यस्तता के शोर में दब जाती है
आज का समाज प्रगति तकनीक और सुविधा की ऊंचाइयों पर है लेकिन मानवीय मूल्यों की ज़मीन खिसकती जा रही है माता-पिता को जिम्मेदारी और बुज़ुर्गों को ‘बोझ’ समझने की मानसिकता तेजी से पनप रही है वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि रिश्ते अब भावना से नहीं सुविधा से तय हो रहे हैं बूढ़ी काकी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि सम्मान उम्र से नहीं उपयोगिता से आंका जा रहा है जैसे ही मनुष्य की उपयोगिता समाप्त होती है उसका मान भी समाप्त मान लिया जाता है यह वही समाज है जहां कभी बुज़ुर्ग अनुभव और आशीर्वाद के स्रोत माने जाते थे और आज उन्हें समय की कमी का बहाना देकर किनारे कर दिया जाता है प्रेमचंद की कथा के अंत में करुणा की एक छोटी-सी किरण दिखाई देती है जो यह संदेश देती है कि मानवता अभी पूरी तरह मरी नहीं है प्रश्न यह है कि क्या आज के समाज में ऐसी करुणा शेष है? या फिर हम इतने आत्मकेंद्रित हो चुके हैं कि हमारे बीच रहने वाली बूढ़ी काकी और बूढ़े काका हमें दिखाई ही नहीं देते? बूढ़ी काकी आज भी हमारे दरवाज़े पर खड़ी है कभी माँ के रूप में कभी पिता के रूप में कभी दादी-दादा के रूप में फर्क बस इतना है कि अब कहानी काग़ज़ पर नहीं हमारे घरों में लिखी जा रही है सवाल यह नहीं कि समाज कहाँ जा रहा है, सवाल यह है कि हम उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं….
:- ललित भसोढ़
:- बातें कही अनकही दिल्ली
