कुमार पंकज जी की संगीत यात्रा शून्य से शिखर तक भक्ति संघर्ष और साधना का अद्वितीय संगम
संगीत केवल सुरों का खेल नहीं है यह आत्मा की भाषा है
जब यही संगीत भक्ति से जुड़ जाता है तो वह साधना का रूप ले लेता है ऐसे ही एक साधक हैं कुमार पंकज जी जिनकी जीवन यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि संकल्प दृढ़ हो गुरु का मार्गदर्शन मिले और मन में भक्ति का दीप प्रज्वलित हो तो शून्य से शिखर तक का सफर भी संभव हो जाता है यह कहानी सिर्फ एक कलाकार की सफलता की नहीं बल्कि संघर्ष,तपस्या,अनुशासन और आत्मिक उन्नति की है एक ऐसी यात्रा जिसमें हर सुर हर शब्द और हर प्रस्तुति के पीछे वर्षों की साधना छिपी है
प्रारंभ एक साधारण जन्म असाधारण संकेत (1969)
10 मार्च 1969 को दिल्ली की मिट्टी में जन्मे कुमार पंकज जी एक सामान्य परिवार से संबंध रखते थे उनके बचपन में संगीत कोई योजनाबद्ध करियर नहीं था न ही कोई विशेष संसाधन उपलब्ध थे लेकिन कई बार प्रकृति स्वयं संकेत देती है उनके भीतर भी स्वर के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण था बचपन में ही जब वे किसी भजन या गीत को सुनते तो अनायास ही उसे गुनगुनाने लगते यह कोई प्रशिक्षण नहीं था बल्कि एक जन्मजात प्रवृत्ति थी एक ऐसा बीज जो समय के साथ एक विशाल वृक्ष बनने वाला था
संघर्ष और दिशा की खोज
हर कलाकार की यात्रा में एक ऐसा दौर आता है जब वह अपने रास्ते को लेकर संशय में होता है कुमार पंकज जी के जीवन में भी यह समय आया एक ओर समाज की अपेक्षाएं थी दूसरी ओर भीतर की पुकार उस समय संगीत को पेशे के रूप में अपनाना आज जितना स्वीकार्य है उतना नहीं था परिवार और समाज की सीमाओं के बीच अपने सपनों को जीवित रखना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी उन्होंने अपने भीतर की आवाज़ को सुना और वही उनकी दिशा बन गई
गुरु-शिष्य परंपरा साधना का वास्तविक आरंभ ( 1987 )
वर्ष 1987 उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ यही वह समय था जब उन्हें स्वर्गीय श्री रवींद्र बिष्ट जी जैसे महान गुरु का सान्निध्य प्राप्त हुआ गुरु केवल तकनीक नहीं सिखाते वे दृष्टि देते हैं और यही दृष्टि कुमार पंकज जी को मिली श्री बिष्ट जी महान शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खान साहब के शिष्य थे जो इंदौर घराने के संस्थापक थे इस घराने की विशेषता है सुरों की गहराई विस्तार और भाव की प्रधानता कुमार पंकज जी ने इस परंपरा को अपनाया उन्होंने रियाज़ को अपनी दिनचर्या बना लिया घंटों-घंटों तक स्वर साधना एक-एक सुर को पकड़ना उसे निखारना यह सब उनके जीवन का हिस्सा बन गया यहां से उनकी यात्रा केवल संगीत सीखने की नहीं रही बल्कि आत्म-संयम और तपस्या की यात्रा बन गई
शैक्षणिक उपलब्धि ज्ञान और साधना का संगम (1992)
साधना का परिणाम हमेशा मिलता है, चाहे देर से ही क्यों न मिले वर्ष 1992 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.फिल.की उपाधि प्राप्त की और साथ ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन में गोल्ड मेडल हासिल किया यह उपलब्धि केवल एक प्रमाण पत्र नहीं थी यह उनके वर्षों के परिश्रम,गुरु के आशीर्वाद और अटूट विश्वास का प्रतीक थी इसने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल एक शौकिया गायक नहीं बल्कि गंभीर साधक हैं
मंच की ओर कदम पहचान की शुरुआत (1995 से)
1995 से उनके जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ मंचीय प्रस्तुतियों का दिल्ली-NCR के विभिन्न मंचों पर उन्होंने नियमित रूप से प्रस्तुति देना शुरू किया उनकी आवाज़ में एक विशेष आकर्षण था उसमें शास्त्रीयता की गहराई भी थी और भक्ति का माधुर्य भी यही कारण था कि वे श्रोताओं के दिलों में जल्दी ही जगह बनाने लगे उन्होंने आकाशवाणी ( All India Radio ) दिल्ली से भजन प्रस्तुत किए दिल्ली दूरदर्शन के “सुबह-सवेरे” कार्यक्रम में दो बार उनकी प्रस्तुति हुई इसके अलावा सहारा समय FM रेनबो और कई क्षेत्रीय चैनलों पर भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया विविध मंच विविध रूप कुमार पंकज जी का संगीत केवल एक शैली तक सीमित नहीं रहा उन्होंने विभिन्न मंचों पर अलग-अलग रूपों में अपनी कला को प्रस्तुत किया
नोयडा गोल्फ क्लब और दिल्ली जिमखाना क्लब जैसे प्रतिष्ठित स्थान
कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर
सेक्टर-19 और सेक्टर-47,नोयडा के मंदिर
शनिधाम छतरपुर ( प्रातः 4 बजे की भक्ति साधना )
नेशनल म्यूजियम और इंडिया गेट जैसे सांस्कृतिक स्थल इन सभी स्थानों पर उन्होंने यह सिद्ध किया कि संगीत का प्रभाव स्थान से नहीं, भाव से तय होता है
गायन की तीन धाराएं एक संतुलित कलाकार
उनकी गायकी को तीन प्रमुख धाराओं में समझा जा सकता है
1 ग़ज़ल और सूफी गायकी
यह उनकी संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई को दर्शाती है हर शब्द में दर्द और हर सुर में आत्मा की झलक मिलती है
2. भजन गायकी
यह उनका सबसे सशक्त पक्ष है। शनि भजन खाटू श्याम, बालाजी,माता चौकी और निर्गुण भजन हर रूप में वे भक्ति का संचार करते हैं
3. बॉलीवुड गायकी
यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है जिससे वे हर वर्ग के श्रोताओं से जुड़ पाते हैं रचनात्मकता गायक से आगे एक सर्जक कुमार पंकज जी केवल गायक नहीं बल्कि एक सृजनकर्ता भी हैं वे अपने भजनों और ग़ज़लों को स्वयं कंपोज करते हैं
उनके दो प्रमुख एल्बम
Old Melodies
Shani Bhajans
ये एल्बम केवल संगीत नहीं बल्कि उनके अंतर्मन की अभिव्यक्ति हैं जहां सुर और भक्ति एक हो जाते हैं
मंच संचालन एक और आयाम
एक सफल कलाकार वह होता है जो मंच को केवल प्रस्तुति का माध्यम नहीं बल्कि संवाद का मंच बनाता है
2007 से वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में मंच संचालन कर रहे हैं रामलीला में 10 दिनों तक लगातार संचालन और भजन गायन नोयडा हाट के सरस आजीविका मेले और सूफी-ग़ज़ल संध्या में उनकी भूमिका उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है
साहित्यिक साधना शब्दों में भी वही गहराई
संगीत के साथ-साथ वे लेखन में भी सक्रिय हैं उनका कविता संग्रह “काश मैं बस का ड्राइवर होता” उनके संवेदनशील मन का प्रमाण है उनकी कविताएं और लेख विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं यह दर्शाता है कि उनकी साधना केवल स्वर तक सीमित नहीं बल्कि विचारों और अभिव्यक्ति तक विस्तृत है
भक्ति यात्रा वर्तमान का उत्कर्ष
आज कुमार पंकज जी “भक्ति यात्रा” और “भजन संध्या” के माध्यम से समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं इन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं
शनि भजन
खाटू श्याम भजन
बालाजी भजन
माता चौकी भजन
निर्गुण भजन उनकी प्रस्तुति केवल सुनने का अनुभव नहीं होती, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा बन जाती है
उनके शब्दों में
“भक्ति का मार्ग स्वयं आनंद का मार्ग है जो न केवल साधक को बल्कि उसके साथ चलने वालों को भी उस रस में डुबो देता है
संघर्ष
जो दिखाई नहीं देता हर सफलता के पीछे संघर्ष छिपा होता है और कुमार पंकज जी की यात्रा भी इससे अछूती नहीं है सीमित संसाधनों में अभ्यास करना समाज की अपेक्षाओं से लड़ना लंबे समय तक पहचान के लिए संघर्ष मंचों तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास इन सबके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी उन्होंने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी
साधना जो उन्हें अलग बनाती है
आज के समय में जहां त्वरित सफलता की चाहत है वहां कुमार पंकज जी की यात्रा हमें धैर्य और निरंतरता का महत्व सिखाती है उनकी साधना के
मुख्य तत्व
नियमित रियाज़ गुरु के प्रति समर्पण
आत्म-अनुशासन भक्ति को केंद्र में रखना यही कारण है कि उनका संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि आत्मिक अनुभव बन जाता है
शून्य से शिखर एक प्रेरणा
कुमार पंकज जी की यात्रा हमें कई महत्वपूर्ण सीख देती है गुरु का महत्व सही मार्गदर्शन के बिना प्रतिभा अधूरी रह जाती है निरंतर अभ्यास सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता
बहुमुखी प्रतिभा विविधता कलाकार को स्थायी बनाती है भक्ति का आधार जब कला में भक्ति जुड़ जाती है तो वह साधना बन जाती है एक यात्रा जो जारी है आज भी कुमार पंकज जी की यात्रा रुकी नहीं है वे लगातार मंदिरों सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भक्ति सभाओं में अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं उनकी सफलता का शिखर केवल प्रसिद्धि नहीं है बल्कि लोगों के हृदय तक पहुंचना है उनका संगीत लोगों को जोड़ता है प्रेरित करता है और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि आपके भीतर सच्ची लगन है, तो कोई भी शुरुआत छोटी नहीं होती और कोई भी लक्ष्य दूर नहीं होता है यदि आप भी भक्ति और संगीत के इस अनूठे संगम का अनुभव करना चाहते हैं तो कुमार पंकज जी की “भक्ति यात्रा” का हिस्सा बन सकते हैं क्योंकि जैसा वे कहते हैं
“भवसागर से पार उतरने के लिए हमारे साथ पथिक बनें
जय श्री राम जय शनि देव जय बालाजी
: – ललित भसोढ़
: – बातें कहीं अनकहीं, दिल्ली

जे गुरु रेनू चरण सिर धरही ते जनु सकल विभव बस कर ही
भक्ति स्वतंत्र सकल सुख खानी सत्संगति जेहि पावै प्रानी