एक भीगा हुआ मन, थोड़ी राहत में...

आज मन जैसे बरस पड़ा…

कोई शोर नहीं,कोई चीख नहीं

बस धीमी,लगातार गिरती बूँदें

भीतर बहुत कुछ जमा था,

दर्द,डर,बेचैनी

शब्दों में ना कह सकने वाली बातें

आज वो सब भीग गया

बारिश बाहर नहीं हो रही “ललित”

आज मन के भीतर हो रही है

हर बूँद कुछ पुराना धो रही है

कोई छूटा हुआ सपना,

कोई अधूरा संवाद,

कोई अनकहा प्रेम

या शायद कोई भूली हुई आवाज़, जो अब वापस लौट रही है

आज पहली बार,

मैंने खुद को कुछ नहीं कहा “ललित”

ना “मजबूत बनो” ना “सब ठीक होगा”

बस चुपचाप बैठा रहा,

और मन को बरसने दिया

और शायद इसी में राहत है

कभी-कभी खुद को गिर जाने देना,

बहने देना,

टूटने देना…

क्योंकि जब मन की बारिश होती है,

तो उसके बाद ही भीतर की मिट्टी से

कोई नया अंकुर फूटता है “ललित”

– एक भीगा हुआ मन, थोड़ी राहत में

: – ललित भसोढ़

: – बातें कहीं अनकहीं, दिल्ली

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