"दिल्ली के बदलते चेहरे का गवाह एक हाकर"
कुछ पाठक आज भी करते हैं इंतजार कब आयेगां "सांध्य टाइम्स"
पटना बिहार से युवावस्था की दहलीज़ पर निकलकर आए जय राम ठाकुर ने 1980 में दिल्ली को अपना ठिकाना बनाया
उस समय दिल्ली बन रही थी बढ़ रही थी और हर गली हर नुक्कड़ पर खबरों की गूंज थी
इसी माहौल में ठाकुर ने अखबार बेचना शुरू किया और देखते ही देखते यह सिर्फ उनका रोज़गार नहीं उनकी पहचान बन गया जब मैं दिल्ली आया था बेटा तो शहर खुद को गढ़ रहा था नई सड़कें नई इमारतें और हर तरफ खबरों की खुशबू थी
जय राम ठाकुर
हाकर बारा खंभा रोड
वो दौर जब अखबार समाज की सांस थे 1980 और 90 के दशक में समाचारपत्र सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं संवाद का सेतु हुआ करते थे
लोग सुबह नवभारत टाइम्स हिन्दुस्तान राष्ट्रीय सहारा जैसे अखबारों से दिन शुरू करते और शाम को ‘सांध्य टाइम्स’ का बेसब्री से इंतज़ार करते थे
सांध्य टाइम्स की इतनी मांग थी कि एक घंटे में 250 कॉपियां बेच देता था
लोग इंतज़ार करते थे कि सांध्य टाइम्स आएं और वो जानें कि शहर में क्या हुआ अखबार उस समय लोगों की भावनाओं और विचारों का प्रतिबिंब थे
हर खबर पर बहस होती थी हर संपादकीय पर चर्चा स्याही से समाज की दिशा तय होती थी
हाकर और पाठक का रिश्ता भरोसे का पुल
जय राम ठाकुर बताते हैं कि उस समय अखबार बेचना सिर्फ एक पेशा नहीं था बल्कि एक रिश्ता निभाने जैसा काम था कई लोग ऐसे थे जो रोज़ मुझसे ही अखबार लेते थे अगर एक दिन नहीं पहुँच पाता तो प्यार से डांटते ‘ठाकुर जी आज कहां रह गए? वो रिश्ता लेन-देन का नहीं अपनापन का था पाठक और हाकर के बीच का यह संबंध शहर की सामाजिक बनावट का हिस्सा था एक अनकहा भरोसा जो हर सुबह के अखबार के साथ जिया जाता था अब जबकि खबरें फोन की स्क्रीन पर हैं और सोशल मीडिया ने अखबारों की भूमिका बदल दी है जय राम ठाकुर जैसे हजारों हाकर रोज़ एक जंग लड़ रहे हैं अस्तित्व की जंग
पहले 250 कॉपी बेच देता था अब मुश्किल से 80 बिकती हैं वो भी उधार में
खबरें अब स्याही से नहीं स्क्रीन से निकलती हैं पर उनमें वो गर्मी नहीं, जो पहले थी डिजिटल युग ने सूचना को तेज़ बना दिया है पर उससे जुड़ी मानवीय संवेदना और स्याही की खुशबू कहीं पीछे छूट गई है दिल्ली बदली पर ठहर गया एक कोना चार दशक से अधिक समय में ठाकुर ने दिल्ली को बनते और बदलते देखा है
कनॉट प्लेस की पुरानी इमारतों से लेकर मेट्रो के आधुनिक गलियारों तक
पर वे आज भी उसी जगह खड़े हैं
बारा खांबा रोड़ पर
: – ललित भसोढ़
: – बातें कही अनकही, दिल्ली
