संघर्षों से शिखर तक शहनाई सम्राट पंडित अशोक कुमार चौरसिया की प्रेरणादायक यात्रा
भारतीय संस्कृति और परंपरा में संगीत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है सदियों से संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि आध्यात्मिकता, संस्कृति और समाज की संवेदनाओं को व्यक्त करने का साधन भी रहा है भारतीय शास्त्रीय संगीत की इसी समृद्ध परंपरा में शहनाई का अपना एक विशिष्ट और पवित्र स्थान है मंदिरों की आरती से लेकर विवाह समारोहों की शुभ शुरुआत तक शहनाई की मधुर ध्वनि को मंगल और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है शहनाई की इसी परंपरा को अपने जीवन की साधना बनाने वाले कलाकारों में पंडित अशोक कुमार चौरसिया का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है उन्होंने अपने अथक परिश्रम, समर्पण और संगीत के प्रति गहरे प्रेम के बल पर न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि भारतीय शहनाई वादन की परंपरा को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया उनका जीवन संघर्ष,साधना और सफलता की ऐसी प्रेरणादायक कहानी है जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती है कि यदि मन में सच्ची लगन हो तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता का मार्ग बनाया जा सकता है
साधारण परिवार से शुरू हुआ असाधारण सफर
पंडित अशोक कुमार चौरसिया का जन्म पुरानी दिल्ली के फराशखाना गली चासरीन क्षेत्र में एक साधारण परिवार में हुआ उनके पिता का नाम बिशन दयाल और माता का नाम अंगूरी देवी था परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था लेकिन संस्कारों और मेहनत की भावना से भरपूर था
बचपन से ही अशोक कुमार चौरसिया के मन में संगीत के प्रति एक विशेष आकर्षण था जब भी किसी धार्मिक आयोजन या विवाह समारोह में शहनाई की मधुर धुन बजती तो वे उसे ध्यान से सुनते और उसी में खो जाते धीरे-धीरे यह आकर्षण उनके जीवन का लक्ष्य बन गया परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण उन्हें बचपन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा कई बार परिस्थितियां ऐसी भी आईं जब संगीत की शिक्षा जारी रखना मुश्किल हो जाता था लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सपनों को टूटने नहीं दिया
गुरु-शिष्य परंपरा में मिली संगीत की शिक्षा
भारतीय शास्त्रीय संगीत में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है इसी परंपरा के अंतर्गत पंडित अशोक कुमार चौरसिया को शहनाई वादन की विधिवत शिक्षा अपने गुरु पंडित हीरा सिंह से प्राप्त हुई
पंडित हीरा सिंह न केवल एक कुशल शहनाई वादक थे बल्कि अपने शिष्यों को संगीत की गहराई और अनुशासन का महत्व भी समझाते थे उनके मार्गदर्शन में अशोक कुमार चौरसिया ने शहनाई वादन की बारीकियों को सीखा रियाज,लय,सुर और भाव की गहराई को समझते हुए उन्होंने संगीत को केवल कला नहीं बल्कि साधना के रूप में अपनाया गुरु के सान्निध्य में बिताए गए वर्षों ने उनके व्यक्तित्व और संगीत दोनों को निखारा उन्होंने सीखा कि एक कलाकार के लिए निरंतर अभ्यास,धैर्य और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण होते हैं
संघर्षों के बीच जारी रही साधना
संगीत की दुनिया में पहचान बनाना आसान नहीं होता विशेषकर तब जब संसाधन सीमित हों पंडित अशोक कुमार चौरसिया के लिए भी यह सफर आसान नहीं था अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने छोटे-छोटे कार्यक्रमों स्थानीय आयोजनों और विवाह समारोहों में शहनाई वादन किया कई बार उन्हें बहुत कम पारिश्रमिक मिलता था लेकिन उन्होंने इसे कभी अपनी साधना में बाधा नहीं बनने दिया उनका मानना था कि हर मंच एक कलाकार के लिए सीखने और अनुभव प्राप्त करने का अवसर होता है धीरे-धीरे उनकी शहनाई की मधुर ध्वनि लोगों के दिलों तक पहुंचने लगी और उन्हें अधिक अवसर मिलने लगे
आकाशवाणी से मिला बड़ा मंच
साल 1983 उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ जब उन्हें आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) पर शहनाई वादन का अवसर मिला यह किसी भी कलाकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम देशभर के श्रोताओं तक पहुंचते हैं
आकाशवाणी पर उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने बहुत सराहा उनकी शहनाई की धुन में भारतीय संगीत की गहराई भावनात्मक अभिव्यक्ति और तकनीकी उत्कृष्टता का अद्भुत संगम दिखाई देता था इस मंच से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उनके संगीत की चर्चा व्यापक रूप से होने लगी
प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुतियां
आकाशवाणी के बाद पंडित अशोक कुमार चौरसिया को देश के विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतिष्ठित मंचों पर शहनाई वादन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा उन्होंने अनेक सांस्कृतिक आयोजनों धार्मिक कार्यक्रमों और सामाजिक समारोहों में अपनी कला का प्रदर्शन किया उनकी शहनाई की धुन में भारतीय परंपरा की आत्मा झलकती है जो श्रोताओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है
स्वतंत्रता दिवस समारोह में ऐतिहासिक प्रस्तुति
पंडित अशोक कुमार चौरसिया के जीवन का एक गौरवपूर्ण क्षण तब आया जब उन्हें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शहनाई वादन का अवसर मिला यह केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि नहीं थी बल्कि भारतीय संगीत परंपरा के लिए भी गर्व का विषय था। इस प्रस्तुति ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई और उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया
नबी करीम से शाहदरा ( बिहारी तक का सफर )
समय के साथ पंडित अशोक कुमार चौरसिया का जीवन और संगीत दोनों नई दिशा में आगे बढ़ते गए। वर्ष 1980 के आसपास वे पुरानी दिल्ली के फराशखाना क्षेत्र से शाहदरा क्षेत्र में आकर बस गए शाहदरा के बिहारी कॉलोनी क्षेत्र में उन्होंने अपने संगीत साधना को आगे बढ़ाया और समाज के साथ गहरा संबंध स्थापित किया यहां उन्होंने संगीत को केवल अपनी कला तक सीमित नहीं रखा बल्कि इसे समाज की नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया
नई पीढ़ी को दे रहे संगीत की शिक्षा
आज पंडित अशोक कुमार चौरसिया केवल एक प्रतिष्ठित शहनाई वादक ही नहीं बल्कि एक समर्पित शिक्षक और मार्गदर्शक भी हैं
शाहदरा स्थित ए.के. म्यूजिकल सोसाइटी के माध्यम से वे युवा पीढ़ी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं यहां वे बच्चों और युवाओं को शहनाई वादन के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूलभूत जानकारी भी देते हैं
उनका मानना है कि संगीत केवल एक कला नहीं बल्कि जीवन को अनुशासन,संवेदनशीलता और सकारात्मक ऊर्जा देने वाला माध्यम है संगीत के प्रति उनका दृष्टिकोण
पंडित अशोक कुमार चौरसिया का मानना है कि संगीत केवल सुर और लय का संयोजन नहीं है बल्कि यह मन और आत्मा की अभिव्यक्ति है जब एक कलाकार पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ संगीत की साधना करता है तो उसकी कला श्रोताओं के दिलों तक पहुंचती है उनका यह भी मानना है कि आज के समय में युवाओं को अपनी परंपरागत कलाओं से जुड़ना चाहिए। भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत है और इसे संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है
युवाओं के लिए प्रेरणा
पंडित अशोक कुमार चौरसिया का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था लेकिन उन्होंने कभी भी परिस्थितियों को अपने सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि किसी व्यक्ति में अपने लक्ष्य के प्रति सच्ची लगन,निरंतर मेहनत और धैर्य हो तो वह किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है
उनकी कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं भारतीय संगीत परंपरा के संरक्षक आज जब आधुनिक संगीत और तकनीक का दौर है ऐसे समय में पंडित अशोक कुमार चौरसिया जैसे कलाकार भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं उनकी शहनाई की मधुर धुन केवल संगीत नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति,परंपरा और आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है
उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची साधना,समर्पण और मेहनत से कोई भी कलाकार अपनी कला के माध्यम से समाज में स्थायी पहचान बना सकता है
:- ललित भसोढ़
:- बातें कही अनकही,दिल्ली
