"अमर प्रेम"
मां की महिमा और समाज की संवेदनहीनता का प्रतीकात्मक आख्यान
“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना…
राजेश खन्ना पर फिल्माए गए इस गाने की यह पंक्ति सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि
“अमर प्रेम” फिल्म की आत्मा है यह फिल्म महज एक प्रेमकथा नहीं बल्कि समाज, मर्यादा, मातृत्व और मानवीय संबंधों का गूढ़ विमर्श है बिना किसी तड़क-भड़क के गिने-चुने किरदारों के माध्यम से
फिल्म की शुरुआत :- देवी के अपमान और आगमन का अद्भुत समन्वय
फिल्म की शुरुआत में एक दृश्य है जो बहुत से दर्शकों की स्मृति में धुंधला हो चुका है लेकिन पर वही इस फिल्म की सबसे बड़ी गहराई है
एक महिला मां,पत्नी,बहू को उसके पति द्वारा घर से निकाल दिया जाता है वह आँसुओं से भरी आँखों और टूटे आत्मसम्मान के साथ गांव छोड़ रही होती है
उसी क्षण गांव में कुछ लोग हाथों में मां दुर्गा की प्रतिमा लेकर प्रवेश कर रहे हैं
यह दृश्य साधारण प्रतीत हो सकता है लेकिन यह हमारे समाज का दोहरा चरित्र उजागर करता है जहाँ एक ओर मूर्ति रूपी मां का स्वागत होता है वहीं ईश्वर की सबसे उत्कृष्ट रचना ममता,प्रेम ,समर्पण और त्याग की मूर्ति एक औरत,मां, बहन,बेटी ,पत्नी को घर से निकाला जाता है
यह दृश्य चुपचाप यह प्रश्न करता है
“क्या हमारी आस्था सिर्फ प्रतिमा तक सीमित रह गई है?”
संगीत :- आत्मा की आवाज़
अमर प्रेम का संगीत केवल गीत नहीं संवाद है आत्मा का संवाद
- “बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया का करें यशोदा मैया”
- “कुछ तो लोग कहेंगे”
- “रैना बीती जाए”
- जैसे गीत अपने शब्दों से नहीं भावों से संवाद करते हैं
इन गीतों की गहराई में प्रेम,पीड़ा, त्याग,और सामाजिक विडंबना समाई हुई है
फिल्म का अंत :- विसर्जन और पुनर्स्थापन का अद्भुत विरोधाभास
फिल्म का अंत भी उतना ही प्रतीकात्मक है जितना आरंभ
आनन्द राजेश खन्ना नंदू ( विनोद मेहरा ) से कहता है
“नंदू, क्या तुम अपनी मां को अपने घर नहीं ले जाओगे?
यह सवाल सिर्फ एक पुत्र से नहीं पूरे समाज से है
“क्या हम उस मां को फिर से स्थान देंगे जिसे हमने अपमानित कर निकाला था?”
नंदू की आंखों में आंसू हैं धुंधलापन है जो केवल उसकी आंखों का नहीं समाज की सोच का भी प्रतीक है उधर पुष्पा की आंखों से अविरल अश्रुओं कि धारा बह रही है जिसे देख आनन्द कहता है पुष्पा हाई हेट टियर और पुष्पा कहती हैं तुम भी तो रो रहें हो
उसी समय सामने से मां दुर्गा की प्रतिमा गंगा विसर्जन के लिए ले जाई जा रही है एक ओर एक मां घर लौट रही है दूसरी ओर एक मां विसर्जित हो रही है एक मां को सम्मान मिल रहा है,
दूसरी को हम फिर से विदा कर रहे हैं
यह दृश्य न केवल गंगा और नंदू के आंसुओं का संगम है बल्कि एक आध्यात्मिक सत्य है मां की महिमा अमर है चाहे वो देवी हो या एक साधारण महिला
“अमर प्रेम” एक फिल्म नहीं एक मौन चीख है
जो उस समाज से सवाल करती है
जो स्त्री को पूजता है लेकिन जीती-जागती स्त्री को अपमानित भी करता है
राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर जैसे कलाकारों ने इस फिल्म को सिर्फ निभाया नहीं जीया है
और यही कारण है कि “अमर प्रेम” आज भी कालजयी है
क्योंकि इसकी कहानी आज भी जीवंत है और शायद जब तक मां को घर से निकाला जाता रहेगा तब तक यह फिल्म प्रासंगिक बनी रहेगी
– ललित भसोढ़,
– बातें कही अनकही, दिल्ली
