प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढाई दशक की राजनीतिक नेतृत्व यात्रा में लिए गए एक के बाद एक चौंकाने वाले फैसलों ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई है। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक, उनके निर्णयों ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को प्रभावित किया है। आज भारत अपनी आवश्यकताओं और संप्रभुता को प्राथमिकता देते हुए फैसले लेता है। यही कारण है कि डोनाल्ड ट्रम्प, पुतिन और शी जिनपिंग जैसे वैश्विक नेताओं के साथ संबंधों में भी भारत अपने हितों को लेकर स्पष्ट रुख अपनाता है। अमेरिकी टैरिफ की धमकियों के बीच अपने हितों की रक्षा करना और रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखना इसी नीति के उदाहरण हैं।
मोदी की राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनके खिलाफ होने वाले कई राजनीतिक हमले उलटे विपक्ष के लिए चुनौती बन गए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते गोधरा कांड के बाद की परिस्थितियों से लेकर प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘चौकीदार चोर है’ और ‘वोट चोरी’ जैसे आरोपों तक, मोदी ने राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया। उनके समर्थकों के लिए यह उनकी नेतृत्व क्षमता का प्रमाण है, जबकि विपक्ष लगातार उनके निर्णयों और नीतियों पर सवाल उठाता रहा है।
गुजरात से शुरू हुई दूरगामी सोच
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने विकास और बुनियादी सुविधाओं पर विशेष जोर दिया। भूकंप प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण, नर्मदा के पानी को पाइपलाइन के माध्यम से उत्तरी गुजरात और सौराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों तक पहुंचाने तथा कृषि और घरेलू बिजली आपूर्ति को अलग-अलग व्यवस्थित कर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली उपलब्ध कराने जैसे प्रयासों ने उनकी प्रशासनिक छवि बनाई।
वाइब्रेंट गुजरात समिट के माध्यम से देशी-विदेशी निवेश आकर्षित करने और सिंगल विंडो व्यवस्था को प्रोत्साहित करने की पहल ने गुजरात को निवेश के प्रमुख केंद्रों में स्थापित करने में भूमिका निभाई। आज देश के अनेक राज्यों में निवेश सम्मेलन आयोजित होते हैं, जबकि गुजरात का निवेश मॉडल चर्चा में बना हुआ है। मेक इन इंडिया जैसी पहल को भी इसी सोच के व्यापक राष्ट्रीय विस्तार के रूप में देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में दृढ़ता
प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर भारत ने अधिक सक्रिय रुख अपनाया। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसी सैन्य कार्रवाइयों ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति को दृढ़ता से सामने रखा। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका और रणनीतिक महत्व बढ़ा है।
धारा 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक और प्रशासनिक रूप से नई व्यवस्था में लाना मोदी सरकार के सबसे बड़े और विवादास्पद फैसलों में शामिल रहा। समान नागरिक संहिता पर बहस, राममंदिर निर्माण और तीन तलाक के खिलाफ कानून जैसे कदमों ने भी देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श को प्रभावित किया।
अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुधार
आर्थिक क्षेत्र में जीएसटी लागू करना एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव था। शुरुआती चुनौतियों और विरोध के बावजूद जीएसटी देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा बन चुका है। नोटबंदी पर आज भी बहस जारी है, लेकिन जनधन खाते, आधार और मोबाइल के संयोजन ने सरकारी योजनाओं के लाभ सीधे लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मेक इन इंडिया, वोकल फॉर लोकल और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए घरेलू विनिर्माण तथा सामरिक उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने का प्रयास हुआ है। पुराने कानूनों को हटाने, भारतीय न्याय संहिता लागू करने और श्रम कानूनों में बदलाव को भी सुधार प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।
महिला सशक्तिकरण के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम, गरीबों के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, आयुष्मान भारत और किसानों के लिए सम्मान निधि जैसी योजनाएं सरकार की प्रमुख पहलों में शामिल हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान टीकाकरण और राहत प्रयासों ने भी भारत की प्रशासनिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा में रखा।
निर्णय क्षमता ही नेतृत्व की पहचान
नरेन्द्र मोदी की ढाई दशक की राजनीतिक यात्रा का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों या आलोचनाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या भारत आज अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय लेने में अधिक सक्षम हुआ है। समर्थकों का मानना है कि मोदी सरकार ने इस दिशा में भारत की स्थिति मजबूत की है।
कठोर निर्णय लेना हमेशा जोखिम भरा होता है। ऐसे फैसलों के परिणामों पर मतभेद हो सकते हैं और उनकी सफलता का आकलन समय के साथ ही संभव है। इसके बावजूद मोदी की राजनीतिक शैली की प्रमुख विशेषता निर्णय लेने का साहस और उन पर दृढ़ रहना रही है। चुनावों में बार-बार मिली सफलता ने उनके नेतृत्व को राजनीतिक मजबूती दी है। यही वजह है कि ढाई दशक की यात्रा में चुनौतियों, विवादों और विपक्ष के तीखे हमलों के बीच भी नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के केंद्रीय व्यक्तित्व बने हुए हैं। उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे कठिन फैसले लेने से पीछे नहीं हटते।
