मां दुर्गा के छठे स्वरूप से जुड़ा है ये औषधीय पौधा, सेहत के लिए है वरदान

नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कात्यायनी को शक्ति, साहस और ओज की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ आयुर्वेद में भी इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है। आयुर्वेद ग्रंथ मार्कंडेय पुराण के अनुसार, देवी दुर्गा के नौ रूपों का संबंध नौ दिव्य औषधियों से है। इसी क्रम में छठे दिन की अधिष्ठात्री देवी मां कात्यायनी का संबंध पोई नामक औषधीय पौधे से जोड़ा जाता है, जिसे संस्कृत में उपोदिका कहा जाता है।

पोई एक अत्यंत उपयोगी, वाजीकारक और त्रिदोषनाशक जड़ी-बूटी है। यह सिर्फ एक साग नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए वरदान है। यह स्वाद में मधुर, तासीर में शीतल, चिकनी, भारी, कफ और पित्त का नाश करने वाली, बल और वर्ण को बढ़ाने वाली तथा रुचि उत्पन्न करने वाली होती है।

पोई की तासीर अत्यंत शीतल होती है। यह शरीर की आंतरिक गर्मी को शांत करती है। हाथ-पैरों में होने वाली जलन, पित्त विकार और एसिडिटी यानी अम्लपित्त की समस्या में यह बेहद लाभकारी है। यह पेट को अंदर से ठंडक पहुंचाती है।

इसकी पत्तियों में प्राकृतिक चिकनाई और भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। यह आंतों की सफाई करती है और पुरानी से पुरानी कब्ज को दूर करने में मददगार है। इसके सेवन से पेट के अल्सर में भी आराम मिलता है और पाचन क्रिया मजबूत होती है।

आयुर्वेद के अनुसार, पोई का सेवन मस्तिष्क की नसों को शांत करता है। यह तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी समस्याओं को दूर करने में प्रभावी है। जिन लोगों को नींद न आने की शिकायत है, उनके लिए यह एक प्राकृतिक औषधि के रूप में काम करती है।

पोई में आयरन, कैल्शियम, विटामिन ए, विटामिन सी और फोलेट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को तेजी से बढ़ाती है और एनीमिया यानी रक्तहीनता को दूर करती है। इसके नियमित सेवन से इम्यूनिटी भी मजबूत होती है।

मां कात्यायनी ओज और सौंदर्य की प्रतीक हैं। पोई का सेवन रक्त को शुद्ध करता है, जिससे चेहरे पर प्राकृतिक चमक आती है। यह कील-मुहांसे, दाद-खुजली और अन्य त्वचा संबंधी विकारों को दूर करने में भी सहायक है।

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