भारतीय राजनीति में गिरती भाषाई मर्यादा: लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास वैचारिक असहमतियों, तीखे तर्कों और धारदार बहसों से समृद्ध रहा है। संसद से लेकर सड़क तक, दक्षिणपंथ, वामपंथ और क्षेत्रीय अस्मिताओं के बीच अनेक वैचारिक संघर्ष हुए, लेकिन विरोधियों के बीच एक मर्यादा बनी रहती थी। दुर्भाग्य से, समकालीन राजनीति में नीतियों पर बहस की जगह व्यक्तिगत आक्षेपों ने ले ली है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दिवंगत पिता को लेकर की गई विवादित टिप्पणी, “मोदी का बाप भी जाएगा”, इसी गिरावट का उदाहरण है। पटना में दिए गए इस बयान ने देशव्यापी राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है और राजनीतिक भाषा की मर्यादा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

यह पहली बार नहीं है जब चुनावी उत्साह में किसी नेता ने भाषाई सीमाएं लांघी हों। राजनीतिक मंचों पर तालियां बटोरने और कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश में अक्सर नेताओं का संयम टूट जाता है। लेकिन किसी राजनीतिक विरोधी के परिवार, विशेषकर ऐसे दिवंगत व्यक्ति को निशाना बनाना, जिसका राजनीति से कोई संबंध नहीं रहा हो, स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। इस बयान के विरोध में भाजपा के देशव्यापी प्रदर्शन और पटना में दर्ज शिकायतों ने विवाद को और बढ़ा दिया है।

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इसे लोकतंत्र की मर्यादाओं पर प्रहार बताया है। वहीं, कांग्रेस और उसके समर्थकों का तर्क है कि बयान को संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया जा रहा है और उसका उद्देश्य वैचारिक विरोध जताना था। हालांकि, सवाल यह है कि क्या राजनीतिक संदर्भ की आड़ में व्यक्तिगत गरिमा को ठेस पहुंचाना उचित ठहराया जा सकता है? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति में संयम और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।

खड़गे कर्नाटक के वरिष्ठ नेता हैं और यह घटना बिहार की राजधानी पटना में हुई। इसलिए इसका प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उत्तर से दक्षिण तक करोड़ों मतदाता अपने नेताओं के व्यवहार को देखते और उससे राजनीतिक संस्कार ग्रहण करते हैं। ऐसे में शीर्ष नेताओं की भाषा राष्ट्रीय राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित करती है।

वास्तविकता यह भी है कि अमर्यादित बयानबाजी किसी एक दल तक सीमित नहीं रही। ‘गद्दार’, ‘दीमक’ और ‘खून का दलाल’ जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श में कटुता बढ़ाते रहे हैं। एक पक्ष की अभद्र टिप्पणी का जवाब दूसरा पक्ष और अधिक तीखी भाषा में देता है। यह दुष्चक्र लोकतंत्र को कमजोर करता है और समाज में वैमनस्य बढ़ाता है। सोशल मीडिया के दौर में नेताओं की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि उनके शब्द पलभर में करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसी बयानबाजी के बीच बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक विकास, आंतरिक सुरक्षा और चीन से जुड़ी सीमा चुनौतियों जैसे गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। युवाओं को नेताओं से रोजगार, शिक्षा, आर्थिक अवसरों और देश के भविष्य पर ठोस चर्चा की अपेक्षा है, न कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की।

राजनीतिक मर्यादा केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान का विषय है। प्रधानमंत्री का पद देश की संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक है, वहीं विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। दोनों पक्षों को अपनी भाषा और आचरण में जिम्मेदारी दिखानी चाहिए।

पटना की यह घटना सभी राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी है। समय आ गया है कि दल मिलकर सार्वजनिक संवाद की न्यूनतम मर्यादा सुनिश्चित करें। जनता नेताओं को उनके काम, नीतियों और आचरण के आधार पर परखती है। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन व्यक्तिगत अपमान लोकतांत्रिक विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता। नेताओं को याद रखना चाहिए कि जुबान फिसल सकती है, लेकिन जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती।

ललित भसोढ़ “रूद्र”
बातें कही अनकही दिल्ली

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