कभी इतिहास की भारी चादर ओढ़े,
तो कभी वर्तमान की धड़कनों में दौड़ती
यह शहर सिर्फ़ ईंट पत्थर नहीं,
यादों,सवालों और जज़्बातों का संगम है
यहां लाल क़िले की दीवारें
सत्ता की कहानियां फुसफुसाती हैं
तो इंडिया गेट के साए में
अनकहे बलिदान चुपचाप खड़े रहते हैं
क़ुतुब मीनार ऊंचाई की सीख देता है,
और कमल मंदिर ख़ामोशी में भरोसे का पाठ
सुबह की दिल्ली
पराठों की खुशबू से जागती है
चाय की प्याली में घुली
लाखों उम्मीदें दिन को आकार देती हैं
शाम ढले ऑटो की आवाज़ें,
सड़क किनारे की चाट,
और हर मोड़ पर ठहरी हुई एक कहानी
किसी की जीत किसी की जद्दोजहद
यहां सपने तेज़ी से चलते हैं
मेट्रो की रफ्तार में
कभी मिलते हैं कभी छूट जाते हैं
दिल्ली दिल वालों की है
पर दिल भी यहीं सबसे ज़्यादा टूटते हैं
फिर भी लोग रुकते नहीं
क्योंकि दिल्ली रुकना नहीं सिखाती
कही बातें
तरक़्क़ी तजुर्बा,ताजगी
अनकही बातें
भीड़ में अकेलापन,
नीचे दबे सवाल,
और बेहतर कल की जिद
दिल्ली विरोधों का शहर है
पुराना और नया,
शोर और सुकून,
सत्ता और सड़क
सब साथ-साथ
इसी टकराव में
दिल्ली की असली पहचान बसती है
दिल्ली को समझना
किताबों से नहीं
गलियों से होता है
जहां हर दीवार कुछ कहती है,
और हर ख़ामोशी
बहुत कुछ छुपाए रहती है
ललित भसोढ़ “रुद्र”
बातें कही अनकही,दिल्ली
