जाने भी दो यारों…मगर कब तक.?

हंसी के पर्दे के पीछे छिपा भ्रष्ट व्यवस्था का कड़वा सच
जाने भी दो यारों…
यह सिर्फ एक हास्य फिल्म का नाम नहीं था वह अपने दौर की व्यवस्था पर ऐसा व्यंग्य था जिसमें हंसी के पीछे भ्रष्टाचार,सत्ता,प्रशासन, बिल्डर और व्यवस्था के गठजोड़ की कड़वी सच्चाई दिखाई गई थी
फिल्म में दो आम लोग सच को कैमरे में कैद करने की कोशिश करते हैं उन्हें लगता है कि सच सामने आएगा तो गलत करने वालों का पर्दाफाश होगा लेकिन कहानी ऐसी करवट लेती है कि सच उजागर करने वाले ही फंसते चले जाते हैं और व्यवस्था के ताकतवर किरदार अपने बचाव के रास्ते तलाश लेते हैं
फिल्म पुरानी हो गई
लेकिन क्या उसकी कहानी पुरानी हुई.?
शायद नहीं
आज भी जब किसी व्यवस्था की लापरवाही से कोई हादसा होता है तो कुछ दिनों तक सवाल उठते हैं जांच के आदेश होते हैं, समितियां बनती हैं, बयान आते हैं जिम्मेदारी तय करने की बातें होती हैं
फिर?
कुछ समय बाद सब शांत
और अगली दुर्घटना का इंतजार

बारिश का पानी…और डूबते सपने

दिल्ली में बरसात कोई नई बात नहीं लेकिन जब बारिश का पानी सड़कों गलियों या बेसमेंट में भरकर किसी की जान ले ले तो वह केवल बारिश की समस्या नहीं रह जाती
2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर के एक कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में पानी भरने से तीन UPSC अभ्यर्थियों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया
वे बच्चे किसी अपराध की दुनिया में नहीं थे
वे अपने सपनों के साथ दिल्ली आए थे
किसी ने IAS बनने का सपना देखा था किसी ने अपने परिवार की जिंदगी बदलने का
लेकिन कुछ घंटों की बारिश ने उनके सपनों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया
सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी हुई थी
सवाल यह है कि व्यवस्था ने उससे निपटने की तैयारी कितनी की थी.?

आग लगी तो बच्चे खिड़कियों से निकले

2023 में मुखर्जी नगर के एक कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना ने भी यही सवाल खड़ा किया था
जिन इमारतों में देश के हजारों युवा अपना भविष्य बनाने के लिए पढ़ते हैं वहां उनकी सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है.?
आग लगने के बाद अगर छात्रों को खिड़कियों से रस्सियों और तारों के सहारे नीचे उतरकर अपनी जान बचानी पड़े तो हमें सिर्फ यह नहीं पूछना चाहिए कि आग कैसे लगी
हमें यह भी पूछना चाहिए
सुरक्षा व्यवस्था पहले क्यों नहीं जांची गई.?
नियमों का पालन किसने सुनिश्चित किया.?
और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था कहां थी.?

और फिर सत्य निकेतन का हादसा

सितंबर 2026 में दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना में छात्रों समेत कई लोगों की मौत ने फिर वही सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया
मलबे के नीचे दबे हुए शरीर केवल ईंट-पत्थरों के नीचे नहीं दबे थे
उनके साथ परिवारों के सपने दबे थे
किसी मां का बेटा था
किसी पिता की उम्मीद था
किसी भाई का सहारा था
किसी बहन का रक्षक था
हादसे के बाद जांच होगी
जिम्मेदारी तय होगी.?
शायद कुछ लोग गिरफ्तार भी होंगे
लेकिन क्या इससे वह परिवार अपना बच्चा वापस पा सकेगा.?
नहीं
भ्रष्टाचार सिर्फ पैसे लेने का नाम नहीं
हम भ्रष्टाचार को अक्सर रिश्वत और पैसे के लेन-देन तक सीमित कर देते हैं
लेकिन भ्रष्टाचार का एक और खतरनाक रूप है
कर्तव्य में लापरवाही
नियमों को नजरअंदाज करना
गलत को देखकर आंखें बंद कर लेना
जिम्मेदारी किसी और पर डाल देना
और हादसे के बाद अपनी जिम्मेदारी से बच निकलना
जब कोई नियम केवल फाइल में रहता है और जमीन पर उसका पालन नहीं होता तो वह भी व्यवस्था की विफलता का हिस्सा बन जाता है
‘जाने भी दो यारों’ आखिर कब तक.?
हमारे सामने हर बार एक नया हादसा आता है
बरसात में मौत
आग में मौत
इमारत गिरने से मौत
सड़क हादसे में मौत
फिर कुछ दिन तक बहस
फिर राजनीतिक बयान
फिर जांच
फिर आश्वासन
और अंत में…
जाने भी दो यारों…
लेकिन जिनके घर का चिराग बुझ गया उनके लिए यह कैसे कहा जाए.?
उनके लिए तो जिंदगी वहीं रुक जाती है
इसलिए अब शायद हमें कहना होगा
जाने भी दो यारों नहीं…
अब हिसाब भी दो यारों
किसने नियम तोड़े?
किसने नियमों की अनदेखी की.?
किस अधिकारी ने निरीक्षण नहीं किया.?
किसकी लापरवाही से खतरा बढ़ा?
किसने शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया.?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या किसी हादसे से पहले जिम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था है.?
क्योंकि हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करना आसान है
असली प्रशासन वह है जो हादसा होने से पहले खतरे को पहचान ले
फिल्म का व्यंग्य आज आईना बन चुका है
‘जाने भी दो यारों’ हमें हंसाती जरूर है लेकिन आज उसे देखते हुए कई बार हंसी नहीं आती
क्योंकि लगता है
अरे यह तो हमारे आसपास ही हो रहा है
चेहरे बदल गए हैं
समय बदल गया है।
तकनीक बदल गई है
लेकिन यदि व्यवस्था में जवाबदेही की कमी बनी रही तो कहानी वही रहेगी
आज कोई छात्र मरेगा
कल कोई मजदूर
परसों कोई आम नागरिक
कुछ दिन शोर होगा
फिर सब सामान्य
क्या यही सामान्य होना चाहिए.?
नहीं
क्योंकि हर मृतक केवल एक संख्या नहीं है
वह किसी परिवार की पूरी दुनिया है
और अगर व्यवस्था की गलती से किसी की जान जाती है तो केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं
जवाबदेही भी चाहिए
पारदर्शिता भी चाहिए
और ऐसी व्यवस्था भी चाहिए जिसमें अगली मौत को रोकने के लिए पिछली मौत से सचमुच सबक लिया जाए
वरना आने वाली पीढ़ियां भी शायद यही कहेंगी
जाने भी दो यारों…
और इतिहास हमसे पूछता रहेगा
लेकिन आखिर कब तक.?

ललित भसोढ़ ‘रुद्र’
बातें कही अनकही,दिल्ली

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