दिल्ली की व्यस्त सड़कों और आधुनिक इमारतों के बीच सेंट्रल रिज रिजर्व फॉरेस्ट में छिपा एक प्राचीन स्मारक है भूली भटियारी का महल झंडेवालान के पास हनुमान मंदिर के पीछे स्थित यह 14वीं शताब्दी का ढांचा फिरोज शाह तुगलक के काल की याद दिलाता है। लगभग 1354 ईस्वी में शाही शिकारगाह ( शिकारगाह ) के रूप में निर्मित यह स्थान आज भी अपनी ऐतिहासिक महत्ता बनाए हुए है लेकिन विगत कुछ वर्षो से इसकी पहुंच और रख-रखाव पर सवाल उठते रहे हैं कई पर्यटक शोधकर्ता और इतिहास प्रेमी यहां पहुंचकर निराश लौटते हैं दिल्ली सरकार को इस धरोहर को पर्यटकों के लिए व्यवस्थित रूप से खोलना चाहिए और उसके आसपास उचित जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
फिरोज शाह तुगलक ( 1351-1388 ) दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के सुल्तान थे जिन्होंने कई बांध शिकारगाह और सार्वजनिक निर्माण करवाए भूली भटियारी का महल भी इन्हीं में से एक है यह सेंट्रल रिज के दक्षिणी छोर पर एक बांध के साथ बनाया गया था संरचना मुख्य रूप से रैंडम रबल मेसनरी ( दिल्ली क्वार्ट्जाइट पत्थर और चूने के मोर्टार ) से बनी है इसमें पूर्व और दक्षिण की दीवारें मजबूत बुर्जों से युक्त हैं उत्तर-पूर्व में दोहरे दरवाजे हैं और एक बड़ा आंगन है पश्चिम की ओर मुख्य हिस्से के अवशेष सीमित हैं
नाम की उत्पत्ति को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं कुछ इसे भटियारी जनजाति की एक महिला ‘भूरी’ या ‘भूली’ से जोड़ते हैं जो रास्ता भटककर यहां पहुंची थी अन्य सिद्धांत इसे ‘बू-अली भट्टी’ या सूफी संत बू अली बख्तियार से जोड़ते हैं ऐतिहासिक दस्तावेजों में स्पष्ट उल्लेख कम है लेकिन पुरातत्व विभाग के अनुसार यह स्पष्ट रूप से तुगलक काल की शिकारगाह है दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग और INTACH ने 2017-18 में इसके संरक्षण का काम किया था जिसमें झाड़ियों की सफाई और संरचना को स्थिर किया गया
वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
आज यह स्थान खंडहरनुमा है लेकिन अपेक्षाकृत अच्छी हालत में बचा हुआ है जंगल की हरियाली और मोरों की आवाज इसे एक शांत अनुभव देती है आधिकारिक जानकारी के अनुसार दिन के समय ( लगभग सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक ) यह खुला रहता है और निकटतम मेट्रो स्टेशन झंडेवालान है प्रवेश शुल्क नहीं है हालांकि सूर्यास्त के बाद प्रवेश प्रतिबंधित है—सुरक्षा वन्यजीव और अवांछित गतिविधियों के कारण लोककथाओं में इसे दिल्ली के ‘भूतिया’ स्थानों में गिना जाता है जहां रात में अजीब आवाजें सुनाई देने की बातें कही जाती हैं ये कहानियां आकर्षण तो बढ़ाती हैं लेकिन सुरक्षा चिंताओं को भी जन्म देती हैं
समस्या यह है कि कई आगंतुक खासकर शोधकर्ता,इतिहास के छात्र और पर्यटक यहां पहुंचकर पर्याप्त जानकारी के अभाव में मायूस हो जाते हैं साइनबोर्ड ऐतिहासिक विवरण या मार्गदर्शन की कमी है कभी-कभी रख-रखाव या अन्य कारणों से पहुंच सीमित महसूस होती है 2025 में दिल्ली पर्यटन विकास निगम ( DTTDC ) ने लैंडस्केपिंग और बागवानी रखरखाव के लिए निविदा जारी की जो सकारात्मक कदम है लेकिन साइनबोर्ड सुरक्षा और व्याख्यात्मक जानकारी पर अभी और ध्यान देने की जरूरत है
क्यों खोलना जरूरी है.?
दिल्ली में ऐतिहासिक स्थल सिर्फ पत्थरों के ढेर नहीं बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति हैं भूली भटियारी का महल तुगलक काल की वास्तुकला, शिकार संस्कृति और रिज क्षेत्र के पर्यावरणीय इतिहास को समझने का अवसर देता है। प्रतिदिन कई लोग स्थानीय युवा फोटोग्राफर शोधकर्ता यहां आते हैं इन्हें निराश करना सांस्कृतिक नुकसान है
पर्यटन को बढ़ावा व्यवस्थित रूप से खोलने से दिल्ली के ‘अनएक्सप्लोर्ड’ स्थलों में यह शामिल हो सकता है जानकारी बोर्ड, छोटे गाइड और दिन के समय सुरक्षित पहुंच से पर्यटक आकर्षित होंगे
शोध और शिक्षा
इतिहास पुरातत्व और पर्यावरण अध्ययन के लिए यह महत्वपूर्ण स्थल है छात्रों और शोधकर्ताओं को आसान पहुंच मिलनी चाहिए संरक्षण नियमित पर्यटन और जागरूकता से अवैध अतिक्रमण नशा या उपेक्षा कम होती है INTACH जैसे संगठनों के अनुभव से पता चलता है कि जागरूकता संरक्षण में मदद करती है
सांस्कृतिक गर्व: लोककथाओं को इतिहास से जोड़कर प्रस्तुत करने से युवा पीढ़ी अपनी विरासत से जुड़ती है
दिल्ली सरकार पुरातत्व विभाग और पर्यटन विभाग को मिलकर कदम उठाने चाहिए
दिन के समय नियमित और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करें
प्रवेश द्वार और परिसर में हिंदी-अंग्रेजी में ऐतिहासिक जानकारी वाले बोर्ड लगाएं निर्माण काल वास्तुकला, नाम की कहानियां और महत्व
सुरक्षा गार्ड की उपस्थिति और बुनियादी सुविधाएं ( रास्ते बेंच ) बढ़ाएं
छोटी-छोटी विरासत वॉक या जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें।
लैंडस्केपिंग के साथ-साथ संरचना की दीर्घकालिक देखभाल सुनिश्चित करें ताकि हरियाली स्मारक पर हावी न हो
भूली भटियारी का महल सिर्फ एक खंडहर नहीं बल्कि दिल्ली की जीवंत विरासत का हिस्सा है इसे बंद या उपेक्षित रखने से इतिहास खुद ‘भूला’ हो जाता है दिल्ली सरकार अगर इसे पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए व्यवस्थित रूप से खोलती है और जानकारी उपलब्ध कराती है तो यह न सिर्फ सांस्कृतिक समृद्धि बढ़ाएगा बल्कि राजधानी की ऐतिहासिक पहचान को और मजबूत करेगा समय आ गया है कि इस भूली हुई धरोहर को फिर से याद किया जाए और उसे जीवन दिया जाए
- ललित भसोढ़ ‘रुद्र’
- बातें कही अनकही कहानी
- महासचिव
- दिल्ली की आवाज़ एनजीओ ( रजि )
