मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘पंच परमेश्वर’ आज भी उतनी प्रासंगिक है जितनी 1920 के दशक में थी दो गहरे दोस्त अलगू मियां और जुम्मन चौधरी जब एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं तो न्याय की मांग सामने आती है जुम्मन जब पंच बनता है तो वह अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी को अलग रखकर अल्गू के पक्ष में फैसला सुनाता है फिर अलगू जब जुम्मन के मामले में पंच बनता है तो वह भी ईमानदारी से जुम्मन के पक्ष में फैसला देता है कहानी का मूल संदेश स्पष्ट है पंच परमेश्वर होता है जब इंसान न्याय की कुर्सी पर बैठता है तो उसे ईश्वर की तरह निष्पक्ष होना चाहिए व्यक्तिगत रिश्ते दोस्ती, दुश्मनी लोभ सब उसके सामने तुच्छ हो जाते हैं
आज के समय में जब शिक्षा महंगी हो गई है नैतिकता बाजार में बिक रही है ईमानदारी को मूर्खता समझा जा रहा है प्रेम स्वार्थ का पर्याय बन गया है और दोस्ती फेसबुक की ‘फ्रेंड लिस्ट’ तक सिमट गई है प्रेमचंद की यह रचना हमें आईना दिखाती है
शिक्षा ज्ञान या सिर्फ डिग्री.?
आज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य नौकरी और पैकेज बन गया है लेकिन प्रेमचंद हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची शिक्षा वह है जो चरित्र निर्माण करती है अल्गू और जुम्मन दोनों पढ़े-लिखे नहीं थे फिर भी उन्होंने पंच बनकर जो न्याय किया वह लाखों आधुनिक डिग्रीधारियों से बेहतर था
आज के स्कूल-कॉलेजों में नैतिक शिक्षा का पाठ लगभग गायब है छात्र टॉप करने के लिए नकल करते हैं पेरेंट्स रिजल्ट के चक्कर में बच्चों का बचपन छीन लेते हैं क्या ऐसी शिक्षा हमें बेहतर इंसान बनाती है.? पंच परमेश्वर की शिक्षा यही है कि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य सत्य और न्याय की रक्षा करना है न कि सिर्फ व्यक्तिगत सफलता
ईमानदारी सबसे दुर्लभ मुद्रा
आज का समय ईमानदारी के लिए सबसे कठिन है सरकारी दफ्तरों से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस तक रिश्वत और सिफारिश सामान्य हो गई है दोस्ती के नाम पर भी लोग एक-दूसरे का फायदा उठाते हैं लेकिन जब अल्गू पंच बना तो उसने सोचा “अगर मैं गलत फैसला दूंगा तो मेरा आत्मा मुझे कभी माफ नहीं करेगा”
ईमानदारी की कीमत आज भी चुकानी पड़ती है प्रमोशन रुक सकता है दोस्ती टूट सकती है रिश्ते बिगड़ सकते हैं फिर भी, जो इस राह पर चलता है वही सच्चा पंच बनता है ईमानदारी कोई कमजोरी नहीं बल्कि सबसे बड़ी ताकत है
नैतिकता और प्रेम स्वार्थ से ऊपर
प्रेमचंद की कहानी में दोस्ती का प्रेम इतना गहरा था कि न्याय के सामने भी वह झुका नहीं। आज प्रेम अक्सर शर्तों वाला होता है “तुम मेरे काम आओगे तो ही दोस्ती” पति-पत्नी माता-पिता और संतान दोस्त हर रिश्ते में “what’s in it for me” वाला हिसाब चल रहा है
सच्चा प्रेम और नैतिकता बिना शर्त होती है जुम्मन ने अपनी पत्नी की जिद के चलते अल्गू के साथ अन्याय किया लेकिन जब वह पंच बना तो उसने अपनी गलती सुधारी नैतिकता का मतलब है गलती मानने और सुधारने का साहस आज हम गलतियों को जस्टिफाई करने में माहिर हो गए हैं लेकिन सुधारने में नहीं
सच्ची दोस्ती परीक्षा की घड़ी में
‘पंच परमेश्वर’ सच्ची दोस्ती की सबसे बड़ी मिसाल है दोस्ती तब सच्ची है जब वह मतभेद के बाद भी बची रहे आज सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स हैं लेकिन मुसीबत में दो-चार ही साथ खड़े होते हैं
अलगू और जुम्मन की दुश्मनी भी अंत में दोस्ती में बदल गई क्योंकि दोनों ने न्याय को ऊपर रखा सच्ची दोस्ती स्वार्थ से परे होती है। वह कहती है मैं तुम्हारा साथ दूंगा भले ही तुम गलत हो लेकिन गलत होने पर तुम्हें सच बताऊंगा भी
आज के समय में पंच बनना
आज हमें हर क्षेत्र में ‘पंच परमेश्वर’ की जरूरत है
शिक्षक जो छात्रों को चरित्र सिखाएं
नेता जो देश को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें
न्यायाधीश और अधिकारी जो कानून को ईमानदारी से लागू करें
माता-पिता जो बच्चों को मूल्य सिखाएं
और हम सब जो रोजमर्रा के फैसलों में निष्पक्षता बरतें।
प्रेमचंद ने लिखा था “पंच परमेश्वर होता है” आज भी यही सत्य है चाहे सोशल मीडिया का ट्रोल हो राजनीतिक दबाव हो, आर्थिक लालच हो या रिश्तों का मोह जब हम पंच की कुर्सी पर बैठते हैं ( यानी कोई फैसला लेते हैं ) तो हमें परमेश्वर बनना चाहिए
‘पंच परमेश्वर’ सिर्फ एक कहानी नहीं एक जीवन-दर्शन है शिक्षा हमें ज्ञान दे नैतिकता हमें दिशा दे ईमानदारी हमें ताकत दे प्रेम हमें जोड़े और सच्ची दोस्ती हमें परीक्षा में खरा उतारने का साहस दे
आज जब पूरा समाज मूल्यों के संकट से गुजर रहा है प्रेमचंद की यह रचना हमें पुकारकर कह रही है पंच बनो, परमेश्वर बनो
क्योंकि अंत में वही जीतता है जो न्याय और सत्य के साथ खड़ा होता है
जय हो पंच परमेश्वर की!
ललित भसोढ़ ‘रुद्र’
बातें कही अनकही दिल्ली
