मतदाता सूची से कटे नामों का सच क्या है और इस मुद्दे पर राजनीति की दिशा क्या होनी चाहिए.?
भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं बल्कि जनता के विश्वास पर टिकी एक संवैधानिक व्यवस्था है इस व्यवस्था की मजबूती इस बात से तय होती है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का अवसर मिले और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बना रहे इसी संदर्भ में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive Revision) को लेकर देश में उठ रहे सवाल महत्वपूर्ण हैं एक ओर निर्वाचन आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को त्रुटिरहित अद्यतन और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए पुनरीक्षण आवश्यक है दूसरी ओर विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समूहों ने आशंका जताई है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं ऐसे में सवाल उठता है कि मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं वे कौन हैं.? उनके नाम किन कारणों से हटाए गए.? और क्या इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का मताधिकार प्रभावित हुआ है.?
इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं बल्कि पारदर्शी जाँच और प्रमाणित आँकड़ों से मिलना चाहिए
एसआईआर क्यों आवश्यक है और इसकी चुनौतियाँ क्या हैं.?
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की बुनियाद होती है यदि इसमें मृत व्यक्तियों के नाम दोहरी प्रविष्टियाँ या ऐसे लोगों के नाम दर्ज हों जो संबंधित क्षेत्र में अब नहीं रहते तो सूची को अद्यतन करना आवश्यक है इसी उद्देश्य से मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया जाता है लेकिन इस प्रक्रिया की सफलता केवल गलत प्रविष्टियाँ हटाने से नहीं मापी जा सकती यह भी देखना जरूरी है कि कोई पात्र नागरिक गलती से सूची से बाहर न हो जाए
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना रोजगार के लिए पलायन करना पते बदलना और दस्तावेजों से जुड़ी कठिनाइयाँ सामान्य परिस्थितियाँ हैं ऐसे में सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान कुछ वास्तविक मतदाताओं की जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है इसलिए एसआईआर की निष्पक्षता का आकलन दोनों पहलुओं से होना चाहिए मतदाता सूची में मौजूद त्रुटियों को दूर करना और प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना
स्वच्छ मतदाता सूची और प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं विरोधी नहीं
आखिर मतदाता सूची से नाम कटने वाले लोग कहाँ हैं.?
यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है
यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस कारण से हुआ क्या संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है.? क्या वह स्थायी रूप से दूसरी जगह चला गया है.? क्या उसकी दोहरी प्रविष्टि थी.? या फिर सत्यापन के दौरान जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण उसका नाम हटाया गया.? इन सभी परिस्थितियों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा इसी प्रकार केवल नाम हटाए जाने के आँकड़े देखकर यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि सभी हटाए गए नाम गलत थे इसके विपरीत यह मान लेना भी उचित नहीं कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट ही नहीं सकता वास्तविक स्थिति जानने के लिए जरूरी है कि निर्वाचन आयोग संबंधित क्षेत्रों के आँकड़े सार्वजनिक करे हटाए गए नामों के कारणों का स्पष्ट विवरण उपलब्ध हो और पात्र मतदाताओं को अपने नाम की स्थिति जाँचने तथा आपत्ति दर्ज कराने की सरल सुविधा मिले
जहाँ किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो वहाँ उसकी शिकायत का समयबद्ध निस्तारण होना चाहिए
लोकतंत्र में किसी मतदाता का नाम सूची से हट जाना केवल एक प्रशासनिक आँकड़ा नहीं है यदि वह पात्र नागरिक है तो यह उसके संवैधानिक अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है
विपक्ष का विरोध लोकतांत्रिक जिम्मेदारी या राजनीतिक रणनीति.? किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है उसका दायित्व सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाना संभावित खामियों को सामने लाना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है इस दृष्टि से एसआईआर पर सवाल उठाना अपने आप में अनुचित नहीं कहा जा सकता यदि विपक्ष को लगता है कि पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं, तो उसे उन मामलों के प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए और प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए संवैधानिक तथा कानूनी रास्ते अपनाने चाहिए लेकिन विपक्ष की जिम्मेदारी केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं हो सकती यदि किसी राजनीतिक दल का दावा है कि बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं तो उसे उपलब्ध प्रमाणों, प्रभावित मतदाताओं के सत्यापित मामलों और संबंधित आँकड़ों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए
इसी प्रकार यदि किसी राजनीतिक दल का आंदोलन व्यापक जनहित से जुड़ा है तो उसके उद्देश्य और परिणामों का आकलन भी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए यह कहना कि एसआईआर के खिलाफ पूरा आंदोलन केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है बिना पर्याप्त प्रमाण के एकतरफा निष्कर्ष होगा उसी तरह विरोध करने वाले प्रत्येक दल के दावों को बिना जाँच सही मान लेना भी उचित नहीं है राजनीतिक दलों के इरादों पर अनुमान लगाने की अपेक्षा उनके काम प्रस्तुत प्रमाणों और प्रभावित लोगों की सहायता के लिए किए गए प्रयासों का मूल्यांकन अधिक उपयोगी होगा सवाल विपक्ष के विरोध करने का नहीं बल्कि यह है कि उसके विरोध से पात्र मतदाताओं को क्या वास्तविक लाभ मिल रहा है निर्वाचन आयोग की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण जब मतदाता सूची की शुद्धता का प्रश्न उठता है तो निर्वाचन आयोग की भूमिका स्वाभाविक रूप से केंद्र में आती है निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसकी जिम्मेदारी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है इस जिम्मेदारी के निर्वहन में मतदाता सूची का सही होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन किसी संस्था की संवैधानिक स्थिति का अर्थ यह नहीं कि उसकी कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल नहीं पूछे जा सकते लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं पर विश्वास और उनकी जवाबदेही साथ-साथ चलते हैं यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं तो उनके कारणों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है पुनरीक्षण की प्रक्रिया नोटिस देने की व्यवस्था दावों और आपत्तियों के निस्तारण तथा नाम दोबारा जुड़वाने के तरीकों के बारे में लोगों को समय पर जानकारी मिलनी चाहिए जहाँ प्रशासनिक चूक सामने आए, वहाँ सुधार की व्यवस्था भी प्रभावी होनी चाहिए निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी केवल गलत प्रविष्टियाँ हटाना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रक्रिया में पात्र नागरिकों के साथ अन्याय न हो इसी प्रकार राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे आयोग पर आरोप लगाते समय उपलब्ध प्रमाणों और निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लें न तो किसी संस्था को सवालों से परे माना जा सकता है और न ही बिना प्रमाण उसके विरुद्ध लगाए गए प्रत्येक आरोप को सच स्वीकार किया जा सकता है
देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं राजनीतिक दल.?
एसआईआर को लेकर चल रही बहस में यह प्रश्न सभी राजनीतिक दलों से पूछा जाना चाहिए उनकी प्राथमिकता क्या है.? क्या उद्देश्य केवल राजनीतिक विरोध को तेज करना है या मतदाता सूची से जुड़े वास्तविक सवालों का समाधान करना भी है.? सरकार और निर्वाचन आयोग को पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए वहीं नागरिक संगठनों और मीडिया की भूमिका यह हो सकती है कि वे वास्तविक मामलों की जाँच करें और जनता तक सही जानकारी पहुँचाएं यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हटाया गया है तो उसे अपना नाम पुन दर्ज कराने में सहायता मिलनी चाहिए यदि कोई नाम नियमानुसार हटाया गया है तो उसके कारणों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए राजनीतिक दलों को यह भी समझना होगा कि मतदाता सूची का विवाद केवल चुनावी राजनीति का विषय नहीं है इसका सीधा संबंध नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता से है आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन आंदोलन की सफलता केवल भीड़ नारों या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मापी जानी चाहिए उसकी सार्थकता इस बात से तय होनी चाहिए कि उससे समस्या के समाधान में कितनी मदद मिली
इसी प्रकार प्रशासनिक प्रक्रिया की सफलता केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं बल्कि सूची की शुद्धता और पात्र नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा से आँकी जानी चाहिए
जनता के सामने स्पष्ट तथ्य क्यों जरूरी हैं.?
इस विवाद का समाधान निकालने के लिए कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने चाहिए।
विभिन्न क्षेत्रों में कितने नाम हटाए गए और उनके प्रमुख कारण क्या थे.?
हटाए गए नामों में से कितने मामले मृत्यु,स्थानांतरण,दोहरी प्रविष्टि या अन्य कारणों से संबंधित थे.?
कितने लोगों ने अपने नाम हटाए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई.?
कितनी शिकायतों का निस्तारण हुआ और कितने पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े गए.?
जिन नागरिकों को प्रक्रिया समझने या आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने में कठिनाई हो रही है, उनकी सहायता के लिए क्या व्यवस्था है.? इन प्रश्नों के जवाब उपलब्ध होने से न केवल जनता की शंकाएँ दूर होंगी बल्कि राजनीतिक दलों के दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना भी संभव होगा जहां किसी प्रकार की अनियमितता सामने आए, वहाँ उसके लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए वहीं जहां आरोप तथ्यहीन साबित हों वहां उन्हें भी स्पष्ट किया जाना चाहिए लोकतंत्र में सच्चाई का निर्धारण राजनीतिक नारों से नहीं बल्कि प्रमाणों और निष्पक्ष जाँच से होना चाहिए
राजनीति अपनी जगह मताधिकार सर्वोपरि
एसआईआर को लेकर चल रही बहस ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखा है—हम ऐसी मतदाता सूची कैसे सुनिश्चित करें, जो शुद्ध भी हो और किसी पात्र नागरिक के अधिकारों को भी सुरक्षित रखे.? इसका उत्तर किसी एक राजनीतिक दल के पास नहीं है। इसके लिए निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी, प्रशासन की तत्परता और नागरिकों की जागरूकता सभी की आवश्यकता है।
विपक्ष को अधिकार है कि वह संभावित अनियमितताओं पर सवाल उठाये लेकिन उसे अपने आरोपों को प्रमाणों से पुष्ट भी करना चाहिए निर्वाचन आयोग को अधिकार है कि वह निर्धारित नियमों के अनुसार मतदाता सूची का पुनरीक्षण करे लेकिन उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पात्र मतदाताओं को अनुचित रूप से बाहर न किया जाए सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं लेकिन इन मतभेदों के बीच आम नागरिक का अधिकार पीछे नहीं छूटना चाहिए अंत में सवाल यह नहीं है कि एसआईआर के पक्ष में कौन है और विरोध में कौन असली सवाल यह है कि क्या इस प्रक्रिया से मतदाता सूची अधिक विश्वसनीय बन रही है .? और क्या प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित है.?
इसका उत्तर न केवल निर्वाचन आयोग को देना है, बल्कि उन सभी राजनीतिक दलों को भी देना है जो लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की रक्षा का दावा करते हैं क्योंकि लोकतंत्र की असली जीत किसी राजनीतिक दल की जीत में नहीं बल्कि नागरिक के विश्वास निष्पक्ष चुनाव और सुरक्षित मताधिकार में निहित है राजनीति चलती रहेगी, आरोप-प्रत्यारोप भी होते रहेंगे लेकिन मतदाता का अधिकार किसी भी राजनीतिक बहस से बड़ा है
- ललित भसोढ़ ‘रुद्र’
- बातें कही अनकही दिल्ली
