‘कोलकाता से आया लड़का है सानू…’, जगजीत सिंह ने ऐसे दिया था कुमार सानू को पहला चांस

भारत के महान गायक और गजल सम्राट दिवंगत जगजीत सिंह की आज यानी शनिवार को पुण्यतिथि है। जगजीत की आवाज जितनी मधुर थी, उतना ही निर्मल उनका व्यक्तित्व था। कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने कितने ही चर्चित सिंगर्स को बॉलीवुड में ब्रेक दिलाया। इनमें से एक थे 90 के दशक के स्टार सिंगर कुमान सानू।

कुमार सानू मुंबई में अपने शुरुआती दिनों में गुजारा करने के लिए होटलों और रेस्टोरेंट में गाना गाया करते थे। संघर्ष का दौर था। इसी दौरान उनकी एक ऐसी शख्सियत से मुलाकात हुई जिसने उनकी किस्मत बदल दी।

कुमार सानू मुंबई के एक स्टूडियो में किशोर कुमार के गाने रिकॉर्ड कर रहे थे। पास के ही स्टूडियो में गजल गायक जगजीत सिंह अपनी रिकॉर्डिंग कर रहे थे। उन्होंने सानू की आवाज सुनी और वह आवाज से बेहद प्रभावित हुए।

जगजीत सिंह ने सानू को अगले दिन अपने घर बुलाया। घर पर सानू ने किशोर कुमार का क्लासिक गाना ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ गाकर सुनाया। जगजीत सिंह ने उसी वक्त उन्हें एक नया गाना सीखने को दिया।

इसके बाद जो हुआ, वह कुमार सानू खुद बताते हैं। इस किस्से का जिक्र कुमार सानू ने द कपिल शर्मा शो के सीजन 2 के एक एपिसोड में भी किया था। उन्होंने बताया था, “जगजीत सिंह ने मुझे अपने घर पर कहा था कि परसों एक शो है, तुम वहां आ जाओ। वहां से शुरू करते हैं, देखते हैं तुम कैसे गाते हो। उस वक्त तो मैं एकदम से डर गया।”

उन्होंने बताया था, “स्टेज पर जाकर जगजीत सिंह कहते हैं कि कोलकाता से आया हुआ एक लड़का है सानू, इसको हम पहला चांस दे रहे हैं। अगर आप लोगों ने पास कर दिया तो ये पास हो जाएगा, नहीं तो ये फेल हो जाएगा। मैं स्टेज पर गया, सुर देने को बोला और जैसे ही मैंने गाना शुरू किया तो सारे लोग वहां खड़े होकर तालियां बजाने लगे।”

जगजीत सिंह उन्हें अपनी कार में बैठाकर फेमस स्टूडियो ले गए। वहां उनका गाना रिकॉर्ड कराया, अपनी जेब से 1,500 रुपए दिए और फिर उन्हें मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया। यहीं से कुमार सानू के लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुले।

जगजीत सिंह का सफर भी आसान नहीं था। उन्होंने पंडित छगनलाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने 1961 में जालंधर में ऑल इंडिया रेडियो से की थी, जिसके बाद वह जिंगल्स गाने और प्लेबैक म्यूजिक में आने के लिए बॉम्बे चले गए।

उन्होंने गजल को एक एलीट क्लास की महफिलों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। उनका ‘बोल-प्रधान’ अंदाज, जिसमें शब्दों की स्पष्टता, गहरी भावनाओं और मधुर धुनों पर जोर होता था, लोगों के दिलों में उतर गया।

पत्नी चित्रा सिंह के साथ मिलकर उन्होंने 1970 और 1980 के दशक में एक मशहूर पति-पत्नी गायक जोड़ी बनाई। 1976 में आया उनका एल्बम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ एक बड़ा ब्रेकथ्रू था। उन्होंने 1987 में भारत की पहली डिजिटली रिकॉर्डेड ऑडियो सीडी ‘बियॉन्ड टाइम’ रिलीज की और गजल प्रोडक्शन में आधुनिक मल्टी-ट्रैकिंग तकनीक की शुरुआत की।

उन्होंने ‘अर्थ’ (1982), ‘साथ साथ’ (1982) और ‘प्रेम गीत’ (1981) जैसी फिल्मों और क्लासिक टीवी सीरीज ‘मिर्जा गालिब’ (1988) के लिए संगीत दिया और गाया।

उनके योगदान के लिए उन्हें 2003 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजा गया। मिर्जा गालिब की रचनाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए 1998 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 2012 में राजस्थान सरकार ने उन्हें मरणोपरांत राजस्थान रत्न से सम्मानित किया। 2014 में भारतीय डाक ने उन पर डाक टिकट जारी किया और 2013 में उनके 72वें जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाकर सम्मान दिया।

उनकी कुछ सबसे मशहूर गजलें आज भी लोगों की जुबान पर हैं, जिनमें फिल्म ‘साथ साथ’ का “तुमको देखा तो ये ख्याल आया”, बचपन की याद दिलाने वाली “वो कागज की कश्ती”, कैफी आजमी लिखित “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो”, जश्न-ए-खुशी वाली “कल चौदहवीं की रात थी”, “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी” और जुदाई का एहसास कराने वाली “चिट्ठी ना कोई संदेश” शामिल हैं।

जगजीत सिंह को ‘गजल किंग’ कहा जाता है। 10 अक्टूबर 2011 को 70 साल की उम्र में मुंबई में उन्होंने आखिरी सांस ली थी।

ललित भसोढ़ “रूद्र”
बातें कही अनकही दिल्ली

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