देवी के नौ स्वरूप और दुर्गा सप्तशती का क्या है संबंध? जानिए शक्तिशाली मंत्र और उनका महत्व

इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर रविवार से हो रही है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दौरान घरों और मंदिरों में देवी आराधना के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती को ‘देवी माहात्म्य’ या ‘चंडी पाठ’ भी कहा जाता है। यह मार्कंडेय पुराण का एक भाग है, जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास ने की है। इस ग्रंथ में 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी दुर्गा की संपूर्ण कथा, रहस्य, कवच, अर्गला, कीलक और उनके विभिन्न प्रकट होने के प्रसंग वर्णित हैं।

दुर्गा सप्तशती में यह बताया गया है कि कैसे महाशक्ति ने समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे महाअसुरों का वध किया। सप्तशती के पहले अध्याय में दैत्य मधु कैटभ के वध, दूसरे अध्याय में देवताओं के तेज से मां दुर्गा के अवतरण और महिषासुर सेना के वध की कहानी है। तीसरे अध्याय में महिषासुर और उसके सेनापति के वध के बारे में बताया गया है। चौथा अध्याय इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा मां की स्तुति, पांचवें अध्याय में चंड मुंड द्वारा राक्षस शुम्भ के सामने देवी की सुंदरता का वर्णन और छठे अध्याय में धुम्रलोचन वध का वर्णन है।

सातवें अध्याय में चंड मुंड वध और आठवें में रक्तबीज के वध के बारे में बताया गया है। अध्याय नौ और दस में निशुम्भ शुम्भ वध की कथा है। ग्यारहवें अध्याय में देव और देवी की स्तुति करके वरदान के बारे में जानकारी दी गई है। बारहवें और तेरहवें अध्याय में देवी के चरित्र की महिमा और वैश्य सुरथ की कथा है, जिसे देवी का वरदान मिला था।

देवी के ये प्रकटीकरण और उनके युद्ध के रूप ही आगे चलकर ‘नवदुर्गा’ की उपासना की परंपरा का आधार बने। दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक हैं, जिन्हें तीन भागों में बांटा गया है। प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) और उत्तर चरित्र (महासरस्वती)। ये तीनों ही महाशक्ति के मूल स्वरूप हैं, जिनसे नौ अलग-अलग देवियों (नवदुर्गा) की आराधना का विधान पुष्ट होता है।

मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भय, शोक और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती जाती है। इसका पाठ विशेष रूप से नवरात्रों में किया जाता है और ये अचूक फल देने वाला होता है।

दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग श्लोकों का अलग महत्व है। इन श्लोकों को पढ़ने से भक्तों को कई लाभ होते हैं।

“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥” यह मंत्र किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत, पारिवारिक सुख, और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

“ऊं जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥” इस मंत्र का जाप जीवन में विजय पाने, संकटों को टालने और मां दुर्गा की कृपा से उन्नति प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

“शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥” यह मंत्र चारों ओर एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, डर और शत्रुओं से रक्षा होती है।

“सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥” इस मंत्र के जरिए तीनों लोकों की पीड़ा हरने वाली मां से गुप्त या प्रत्यक्ष शत्रुओं के विनाश और जीवन की बड़ी बाधाओं को शांत करने की प्रार्थना की जाती है।

“सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति नसंशयः॥” इस मंत्र के जाप से मां दुर्गा की अनुकंपा से घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

ललित भसोढ़ “रूद्र”
बातें कही अनकही दिल्ली

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