एक समय था जब रेलवे स्टेशन सिर्फ़ सफ़र की शुरुआत नहीं बल्कि भावनाओं का संगम हुआ करता था
उसी दौर में प्लेटफ़ॉर्म के एक कोने में खड़ी रहती थी एक रंग-बिरंगी मशीन गोल शीशे वाली झिलमिलाती रोशनी से सजी जिस पर लिखा होता था
अपना वज़न करें – केवल ₹1 में
वो मशीन यात्रियों के लिए जिज्ञासा, बच्चों के लिए खेल और बड़ों के लिए मुस्कान का कारण बन जाती थी
ट्रेन के आने में जब समय होता लोग एक रुपये का सिक्का डालते और मशीन के भीतर रोशनी घूमने लगती
कुछ ही पलों में बाहर निकलती एक छोटी-सी टिकट पुराने जमाने की रेल टिकट जैसी
उस पर लिखा होता था आपका वज़न और साथ में कोई प्यारा वाक्य
कभी “स्वास्थ्य ही धन है” कभी “आपका दिन शुभ हो” या फिर मुस्कान बनाए रखें
बच्चे उस टिकट को ख़ज़ाने की तरह संभालते,बुज़ुर्ग उसे जेब में रखते हुए हल्के-से मुस्करा देते
और कभी-कभी तो हम शरारत में तीन-तीन लोग एक साथ मशीन पर चढ़ जाते यह देखने के लिए कि अब वजन कितना दिखाएगी
फिर जो हंसी-ठिठोली होती वह आज तक याद है मानो वह मशीन वज़न नहीं खुशियों का माप ले रही हो
आज प्लेटफ़ॉर्म वही हैं रेलगाड़ियाँ और भी तेज़ हो गई हैं पर वो मशीनें कहीं खो गईं
उनके साथ खो गया वह दौर भी जब ₹1 का सिक्का भी मुस्कान खरीद सकता था
अब जब कभी किसी पुराने यात्री से उस मशीन की चर्चा छिड़ती है तो आंखों में चमक लौट आती है
क्या दिन थे वो… जब वज़न से ज़्यादा यादें तौली जाती थीं
-ललित भसोढ़ ‘रुद्र’
-बातें कही अनकही दिल्ली
