संस्मरण “शांत हो गई एक वियोगिनी की दहाड़”

यह कोई साधारण घटना नहीं थी… यह प्रकृति के उस मौन संवाद की चीख थी जिसे शब्दों में बाँधना किसी भी संवेदनशील हृदय के लिए एक पीड़ादायक अनुभव है यह कहानी है प्रेम की वियोग की और उस अपार वेदना की जिसे एक नारी चाहे वह इंसान हो या वन्य जीव—अपने हृदय में सँजोए रहती है

यह बात 90 के दशक की है। राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों में एक खबर छपी थी लेकिन यह खबर नहीं थी… यह एक वेदना का स्वरचित्र था जिसका शीर्षक था “शांत हो गई एक वियोगिनी की दहाड़” यह समाचार नहीं एक जीवन का अंतिम संवाद था… एक अनकहा आख्यान, जिसे न किसी ने बोला न किसी ने सुना पर जिसने भी पढ़ा उसका मन भीग गया

घटना हरिद्वार के निकट बसे छोटे से शांत और प्रकृति की गोद में बसे मोतीचूर रेलवे स्टेशन की है स्टेशन की शांति हरियाली और दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों के बीच यह जगह एक तपस्वी की तरह नीरव प्रतीत होती है लेकिन एक दिन इस शांति में वह चीख गूंजी जो केवल प्रेम-वियोग की अंतिम पुकार हो सकती थी

घना जंगल और उसमें से भटकता हुआ एक शेर-शेरनी का जोड़ा… शायद अपनी ही दुनिया में लीन… मगर नियति कुछ और ही लिख चुकी थी उसी समय एक तेज़ रफ्तार ट्रेन पटरियों पर बढ़ती हुई आई और उस शेर को अपनी चपेट में ले लिया। पलभर में शेर धराशायी हो गया शेरनी वहीं ठिठक गई। क्षण भर के लिए जैसे सारा जंगल सारी हवाएं और वह छोटा सा रेलवे स्टेशन थम गया

सुबह होते ही शेरनी वापस जंगल की ओर लौट गई… और इंसान, हमेशा की तरह थोड़ी देर अफसोस कर अपनी दुनिया में लौट गया

परंतु जंगल की वह रानी कहां लौट पाई थी.? वह तो यहीं छूट गई थी मोतीचूर की उस धरती पर जहां उसका जीवन उसका साथी उसकी दुनिया सब कुछ खत्म हो गया था

रात हुई और स्टेशन पर गूंज उठी वियोगिनी की दहाड़ वह दहाड़ जो जंगल से नहीं हृदय के कोने से निकलती थी वह दहाड़, जो क्रोध की नहीं बिछोह की होती है लोगों ने पहली रात उसे अनहोनी समझा फिर यह सिलसिला दिन-प्रतिदिन चलता गया लोग शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते और वह शेरनी रातभर स्टेशन के पास घूमती रहती दहाड़ती रहती… शायद किसी उत्तर की प्रतीक्षा में

वन विभाग आया, जाल बिछाए गए तरकीबें आजमाई गई पर वह वियोगिनी किसी के जाल में नहीं फँसी उसका दर्द उसका व्रत किसी पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता था

और फिर एक रात वही ट्रेन… वही लोहे का दानव जिसने उसका संसार छीन लिया था स्टेशन की ओर बढ़ रहा था शेरनी वहीं थी शायद वह जानती थी कि यह क्षण अंतिम है जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर पहुँची शेरनी ने पूरी ताकत से दहाड़ते हुए उस पर छलांग लगा दी… और वह भी सदा के लिए शांत हो गई

कहते हैं प्रेम अमर होता है इस प्रेम की परिणति भी अमरत्व में ही हुई

यह सिर्फ एक वन्य घटना नहीं थी। यह एक प्रेम कथा थी एक वियोग गाथा थी—जहां शब्द कम पड़ जाते हैं और संवेदनाएं बरसने लगती हैं पत्रकार ने अपनी लेखनी से इसे खबर नहीं श्रद्धांजलि बनाई और शीर्षक दिया

“शांत हो गई एक वियोगिनी की दहाड़”

इस कथा को पढ़कर मन नत हो जाता है एक पशु भी जब प्रेम करता है तो वह भी अपनी सीमा से आगे जा सकता है और हम.? क् दर्जया हमने कभी अपने संबंधों में ऐसी निष्ठा ऐसा समर्पण महसूस किया है.?

यह संस्मरण हमें याद दिलाता है कि प्रेम जब सच्चा होता है तो वह भाषा नहीं भावना में जीता है जंगल की वह रानी आज भले मौन हो पर उसकी दहाड़ आज भी मोतीचूर की हवाओं में गूंजती है…

श्रद्धांजलि उस वियोगिनी को जिसने प्रेम की अंतिम परिभाषा रच दी

ललित भसोढ़ ‘रूद्र’
बातें कही अनकही दिल्ली

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